“गुरु मूर्तिकार के समान, जो किसी शिष्य के दुर्गुणों को छांटकर उसे एक श्रेष्ठ मानव के रूप में गढ़ते हैं’

भास्कर न्यूज | जालंधर दिव्य ज्योति जागृति संस्थान ने विधिपुर आश्रम में बुधवार को सत्संग समारोह आयोजित किया। कार्यक्रम में दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी सुखबीर भारती ने इंसान के जीवन में गुरु के महत्व से अवगत करवाया। साध्वी ने कहा कि मनुष्य जन्म ईश्वर की भक्ति के लिए मिला है, लेकिन ईश्वर को हम खुद प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए एक सतगुरु की नितांत आवश्यकता होती है। गुरु ही वह मध्यस्थ हैं, जो हमें ईश्वर से मिला सकते हैं। यह परमात्मा द्वारा निर्मित एक अटल नियम है, जिसे हम और आप चाह कर भी नहीं उलट सकते। साध्वी ने कहा कि यह नियम उतना ही अपरिवर्तनीय है, जितना सूरज का पूर्व से उदित होना और पश्चिम में अस्त होना। स्वयं रचयिता भी जब साकार रूप धारण कर इस संसार में आया, तो उसने इस नियम का अनुपालन किया। जैसे भगवान राम गुरु वशिष्ट जी के आश्रम में शरणागत हुए। श्री कृष्ण ने ऋषि दुर्वासा जी से ज्ञान दीक्षा ली। आज हम इन अवतारों को अपना ईष्ट मानते हैं। इन तीनों लोकों के नायकों ने गुरु का वरण कर समस्त मानव जाति को एक ही वृहद संदेश दिया कि बिना गुरु के मुक्ति संभव नहीं है। साध्वी जी ने आगे बताया कि जैसे एक मूर्तिकार अनगढ़ पत्थर में से भी एक सुंदर मूर्ति तराश देता है, ऐसी मूर्ति जो पूजनीय बन जाती है, समाज उसके समक्ष नतमस्तक हो उसकी पूजा करता है। यही कार्य गुरु का भी है। गुरु एक सर्वोत्कृष्ट मूर्तिकार है। उसे भी अपने अनगढ़ शिष्य में एक श्रेष्ठ मानव दिखाई पड़ता है। अतः उसे तराशने के लिए वह उन सभी दुर्गुणों को काटता-छांटता है, जो उसकी आकृति को भद्दा बनाए हुए हैं।

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