शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शुक्रवार को मुरैना आए। मीडिया से बातचीत में उन्होंने गौ माता, भारत के विश्व गुरु होने के सवाल, बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति और भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने जैसे मुद्दों पर अपनी अपने विचार रखे। शंकराचार्य ने कहा कि सरकारें गौ माता की दुर्दशा के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं और उन्हें केवल हिंदू पार्टी या सरकार कहने भर से बदलाव नहीं आएगा। गौ माता को गोमाता कहा जाता है, लेकिन उसे पशुओं की सूची में शामिल कर दिया गया। यह गलती सरकारों की है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से सत्ता में रहकर भी सरकारें इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा पाईं। गौ माता की दुर्दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सरकारें ही हैं। उन्होंने कहा, जो पार्टियां अपने को हिंदू हितैषी कहती हैं, उन्हें गौ माता की स्थिति सुधारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए, सिर्फ वादों और प्रचार से वास्तविक समस्याएं हल नहीं हो सकतीं। कहा- भारत अपनी मौलिकता भूल गया
भारत के विश्व गुरु होने के सवाल पर शंकराचार्य ने कहा, आज का भारत विश्व गुरु नहीं, बल्कि विश्व चेला बन गया है। भारत हर चीज में अन्य देशों की नकल करता है, अपनी मौलिकता को भूल गया है। यह स्थिति विश्व गुरु बनने में सबसे बड़ी बाधा है। भारत के पास खुद का ज्ञान और परंपरा है, लेकिन इसे अपनाने के बजाय हम विदेशों से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में भारत का विश्व गुरु बनने का दावा खोखला है। बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति को शंकराचार्य ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। कहा, बांग्लादेश कभी हमारा परिवार था। वहां के लोग हमारे ही थे। लेकिन भारत सरकार की उदासीनता के कारण अब वहां के लोगों को यह एहसास हो गया है कि उनके पीछे कोई नहीं खड़ा है। भारत सरकार ने इस मामले में हमेशा अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने का रवैया अपनाया। भारत सरकार, जो गांव-गांव में चुनावी रैलियां करती है, क्या बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर कोई कदम नहीं उठा सकती? बोले- मंदिरों-धार्मिक स्थलों को सही से संचालित किया जाए
भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किए जाने के सवाल पर शंकराचार्य ने कहा, हिंदू राष्ट्र केवल नामकरण है। इससे क्या बदलाव आएगा? अगर किसी अंधे का नाम नैनसुख रख दिया जाए, तो क्या उसे दिखने लगेगा? वास्तविक परिवर्तन केवल नाम बदलने से नहीं होगा। इसके बजाय, मंदिरों और धार्मिक स्थलों को सही तरीके से संचालित किया जाए और उन्हें हिंदू धर्माचार्यों के हवाले किया जाए। इस समय गंगा-यमुना बांधी जा रही है और प्रसाद में चर्बी बांटी जा रही है। ऐसे में हिंदू राष्ट्र केवल एक नारा बनकर रह जाएगा। मंदिरों के संचालन में बदलाव जरूरी
शंकराचार्य ने कहा कि सरकारों को मंदिरों के नियंत्रण से दूर रहना चाहिए। सुझाव दिया कि मंदिरों का प्रबंधन पूरी तरह से हिंदू धर्माचार्यों और विद्वानों के हाथों में सौंपा जाना चाहिए। जब तक धार्मिक स्थलों का संचालन धर्म के अनुसार नहीं होगा, तब तक समाज में परिवर्तन संभव नहीं है। उन्होंने भारत में धर्म के मुद्दों पर सरकार की उदासीनता की भी आलोचना की। कहा कि धर्म को राजनीतिक प्रचार और वोट बैंक की राजनीति से परे रखकर ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए। नाम बदलने और नारे देने से समाज नहीं बदलेगा। इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने की जरूरत है। समाज को दिया आत्मनिर्भरता का संदेश
अपनी बातचीत में उन्होंने समाज को आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया। कहा कि हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों को समझने और उन्हें अपनाने की आवश्यकता है। दूसरों की नकल करके हम अपनी पहचान और शक्ति को खो रहे हैं। यह आत्म मूल्यांकन का समय है और इसके लिए हर भारतीय को कदम उठाने की जरूरत है।


