प्रकृति और मानव के बीच का संबंध पिछले कुछ समय में काफी तनावपूर्ण हो गया है। इसी को देखते हुए झारखंड जैव विविधता पर्षद ने 9 सितंबर को पलाश भवन, डोरंडा में जैव विविधता की समझ और क्रियान्वयन विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला और प्रशिक्षण का आयोजन किया। कार्यक्रम का मार्गदर्शन पर्षद के सदस्य सचिव व पीसीसीएफ संजीव कुमार ने किया। कार्यक्रम में 300 प्रतिभागियों ने भाग लिया। तकनीकी सत्र में डॉ. प्रशांत मिश्रा, डॉ. प्रसेनजीत मुखर्जी, डॉ. हर्पित सिंह व डॉ. योगेश्वर मिश्रा ने प्रस्तुति दी। सीमित हैं पृथ्वी के संसाधन, मिलकर करें संरक्षण मुख्य अतिथि झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव मो. अबूबकर सिद्धिक थे। उन्होंने कहा कि हम सभी के लिए एक मजबूत और शांतिपूर्ण दुनिया का निर्माण तभी हो पाएगा, जब हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाएंगे। तेज औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का नुकसान हो रहा है। ये केवल पर्यावरणीय संकट नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी खतरा है। स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और उपजाऊ मिट्टी के बिना जीवन असंभव है । ये प्रकाशन हुए जारी : पर्षद द्वारा संकलित एक त्रैमासिक जर्नल और खोरठा भाषा में लिखी गई पुस्तक ‘’धरती पर जीवन की विविधता’’ का विमोचन हुआ । ‘झारखंड राज्य में जैव विविधता अधिनियम का क्रियान्वयन’’, ‘जैव विविधता विरासत स्थल हमारी प्रकृति का अमूल्य धरोहर’’, ‘जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 एक संक्षिप्त विवरण’’, व ‘जैव विविधता संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों का सशक्तीकरण’’ पुस्तिकाएं जारी की गईं। विशिष्ट अतिथि पीसीसीएफ हॉप अशोक कुमार ने झारखंड के समृद्ध वन्यजीवन और वनों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य में उष्ण कटिबंधीय शुष्क पतझड़ी वन, नम पतझड़ी वन, शुष्क प्रायद्वीपीय वन और शुष्क मिश्रित पतझड़ी वन पाए जाते हैं। झारखंड का कुल 25,118 वर्ग किमी का क्षेत्र वनों से आच्छादित है, जो 31.51% है।


