रांची में दुर्गा पूजा के साथ रावण दहन भी प्रसिद्ध है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ को जलते देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। पहले सिर्फ मोरहाबादी में रावण का दहन होता था। अब मोरहाबादी के साथ अरगोड़ा, एचईसी, नगड़ी, कटहल मोड़ सहित कई जगहों पर रावण को जलाया जाता है। खुद मुख्यमंत्री भी पुतला दहन में शामिल होते हैं। इस बार राजधानी में 5 जगहों पर पुतले जलेंगे, जिन्हें दो जगहों पर बनाया जा रहा है। गया के माहिर कारीगर मो. मुस्लिम 27 साल से रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार कर रहे हैं। कहते हैं कि शुरुआत में छोटे पुतले बनते थे। उस समय 40 हजार मेहनताना मिलता था, अब लाखों खर्च होता है। इतिहास…1948 में पहली बार रावण दहन हुआ, सिर की जगह गधे का मुंह था रांची में रावण दहन की शुरुआत 1948 में हुई थी। आजादी के समय पश्चिमी पाकिस्तान के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के इलाके बन्नु शहर से रिफ्यूजी बन कर 10-12 परिवार रांची आए और रावण दहन के रूप में दशहरा मनाया। स्व. लाला खिलंदा राम भाटिया जो बन्नुवाल रिफ्यूजी के मुखिया थे। तब के डिग्री कालेज (रांची कॉलेज) के प्रांगण में 12 फीट के रावण का निर्माण स्व. लाला मनोहर लाल नागपाल, स्व. कृष्ण लाल नागपाल, स्व. अमीर चंद सतीजा, स्व. टहल राम मिनोचा, शादीराम भाटिया व स्व. किशन लाल शर्मा ने मिलकर किया था। उस समय रांची सहित पंजाब के तमाम शहरों में रावण का मुखौटा गधे के मुंह के जैसा बनाया जाता था। 1953 के बाद रावण के पुतले का मुखौटा मानव मुख का बनने लगा। 12 वर्षों तक स्व. अशोक नागपाल स्वयं रावण के पुतले का निर्माण करते थे। 1960 से पंजाबी-हिंदू बिरादरी के लोग मोरहाबादी में दहन करने लगे। 160 बांस, 80 केजी बोरे, 250 मी. कपड़े व कागज-लेई लगे रावण, कुंभकर्ण व मोघनाथ के पुतले बनाने के लिए कारीगर बिहार के गया, पटना और मुजफ्फरपुर से आए हैं। पुतले बनाने में एक जगह में 160 बांस, 80 केजी जूट के बोरे, 250 मीटर कपड़े, 50 केजी कागज, 50 केजी लेई-गोंद, 50 केजी सुतली रस्सी लग रहे हैं। बांस की पतली पट्टी और सुनहरे कपड़े से रावण का लंका भी इस बार तैयार किया जा रहा है। दशमी के दो दिन पूर्व पटाखा पार्टी के लोग पुतलों में पटाखे भरेंगे।


