भास्कर न्यूज| लुधियाना पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) अब हरित क्रांति के बाद डिजिटल एवरग्रीन क्रांति की राह पर है। यूनिवर्सिटी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स, ओमिक्स साइंस और जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी के जरिए खेती को टिकाऊ और स्मार्ट बना रही है। हाल ही में पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने पीएयू का दौरा किया। उन्होंने एग्रो प्रोसेसिंग और बायोटेक्नोलॉजी की नई सुविधाओं का उद्घाटन किया। इस दौरान कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने उन्हें यूनिवर्सिटी की तकनीकी योजनाओं की जानकारी दी। पीएयू का लक्ष्य एक ऐसा स्मार्ट एग्रीकल्चर इकोसिस्टम बनाना है, जहां फैसले नहीं, डेटा खेती की दिशा तय करेगा। यूनिवर्सिटी खेती के हर हिस्से में एआई, ड्रोन, आईओटी सेंसर, रोबोटिक्स, स्पेक्ट्रोस्कोपी और जीआईएस जैसी तकनीकों को शामिल कर रही है। इससे फसल की निगरानी, सटीक खाद-पानी प्रबंधन और कीट नियंत्रण आसान होगा। सैटेलाइट इमेजरी और स्पेक्ट्रोस्कोपी से किसान उपज का पूर्वानुमान लगा सकेंगे। मिट्टी की सेहत जांच सकेंगे। पोषक तत्वों की कमी और मौसम के बदलाव का समय रहते जवाब दे सकेंगे। मॉलिक्यूलर स्तर पर पीएयू जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, मेटाबोलोमिक्स और फीनोमिक्स को एआई से जोड़ रहा है। इससे जलवायु के अनुकूल और अधिक उपज देने वाली किस्में तैयार होंगी। यह किसानों की आय बढ़ाने, रसायनों के अत्यधिक उपयोग और कीट प्रकोप जैसी समस्याओं का हल देगा। डॉ. गोसल ने बताया कि यूनिवर्सिटी ने स्मार्ट एग्रीकल्चर के लिए डिजिटल इनोवेशन स्कूल (एस-डिसा) शुरू किया है। इसके लिए 5 करोड़ रुपए का फंड मिला है। इसमें से आधा पंजाब सरकार ने दिया है। जुलाई से दो नए कोर्स शुरू होंगे मेकाट्रॉनिक्स में पीजी डिप्लोमा और एआई व डेटा साइंस इन एग्रीकल्चर में एमटेक। इसके लिए आईआईटी, बिट्स पिलानी और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से साझेदारी की गई है। ड्रोन तकनीक को बढ़ावा देने के लिए पीएयू ने कृषि मंत्रालय से मान्यता प्राप्त रिमोट पायलट ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन (आरपीटीओ) शुरू किया है। यहां ग्रामीण युवाओं को ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। 2012 में पीआरएससी के साथ शुरू किया गया मास्टर्स प्रोग्राम अब भी रिमोट सेंसिंग और जीआईएस के जरिए खेती में मदद कर रहा है। यूनिवर्सिटी के ड्रोन स्प्रे के लिए बनाए गए एसओपी अब इस्तेमाल में हैं। केंद्र सरकार यूएवी से रोग और कीट की पहचान कर रही है। फसल की नस्ल सुधार में भी पीएयू आगे है। 2024 में शुरू हुआ एक्सेल ब्रीड स्पीड ब्रीडिंग सेंटर, हाई थ्रूपुट जीनोटाइपिंग लैब और 1500 जंगली गेहूं व 1200 जंगली धान की किस्मों का संग्रह इसमें मदद कर रहा है। एआई, सेंसर, ड्रोन और जीनोमिक्स से आने वाले डेटा को संभालने के लिए यूनिवर्सिटी हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म तैयार कर रही है। जीएस खुश इंस्टीट्यूट ऑफ जेनेटिक्स, प्लांट ब्रीडिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी की डायरेक्टर डॉ. परवीन छूनेजा ने इस पर प्रेजेंटेशन दी। इससे फसल की उपज और रोगों का पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा। फीनोटाइप, जीनोटाइप और पर्यावरणीय डेटा का एक साथ विश्लेषण होगा। इससे खेती में सटीक और टिकाऊ फैसले लिए जा सकेंगे।


