भास्कर संवाददाता | बड़वानी शुक्रवार सुबह शहर उस विराट पुण्य क्षण का साक्षी बना, जब दिगंबर जैन परंपरा के तीन महान आचार्यों का ऐतिहासिक मंगल मिलन हुआ। गणधराचार्य पुष्पदंत सागर महाराज, आचार्य प्रसन्न ऋषि महाराज एवं आचार्य विप्रणत सागर महाराज के पावन चरण रज से समूचा क्षेत्र धर्ममय हो उठा। इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बने श्रद्धालु स्वयं को अत्यंत धन्य अनुभव करते रहे। आचार्यों की जय‑जयकार और जैन धर्म की जयघोष से पूरा शहर गुंजायमान हो गया। आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज क्रांतिकारी संत तरुण सागर महाराज के शिष्य एवं पुष्पगिरी तीर्थ के प्रणेता हैं। जबकि आचार्य प्रसन्न ऋषि महाराज गुरुदेव ऋषि तीर्थ के प्रणेता हैं। दोनों आचार्य पद विहार करते हुए सिद्धक्षेत्र बावनगजा के दर्शन के लिए बड़वानी पहुंचे। वहीं आचार्य विप्रणत सागर महाराज कुछ दिन पूर्व ही बड़वानी एवं बावनगजा पहुंचे थे। उनके सानिध्य में समाजजनों द्वारा आचार्यों की भव्य मंगल अगुवानी की गई। समाज के महिला‑पुरुष, युवा व बच्चों ने आचार्यों, मुनि एवं क्षुल्लक महाराजों के पाद प्रक्षालन कर, श्रीफल अर्पित किए तथा मंगल आरती उतारकर आशीर्वाद प्राप्त किया। शहर के दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य भगवंतों ने हास्यपूर्ण एवं वात्सल्यमयी आशीर्वचन देते हुए समाज के सर्वांगीण कल्याण की मंगल कामना की। इसके बाद आहारचर्या संपन्न हुई। प्रातः मुनिश्री प्रणुत सागर महाराज का मंगल विहार बावनगजा सिद्धक्षेत्र के लिए हुआ। जहां समाज एवं ट्रस्ट कमेटी द्वारा उनकी भावपूर्ण अगुवानी की गई। दोपहर में मुनिश्री प्रणुत सागर एवं मुनिश्री जयकीर्ति महाराज के ससंघ सानिध्य में पंडित मौसम शास्त्री द्वारा भक्तामर विधान एवं ध्वजारोहण संपन्न कराया गया। दोपहर पश्चात तीनों आचार्य ससंघ बड़वानी से मंगल विहार करते हुए सिद्धक्षेत्र बावनगजा पहुंचे। 9 महीने पहले इंदौर में मिले थे तीनों आचार्य तीन आचार्यों का यह दिव्य मिलन इससे पूर्व 9 माह पहले अप्रैल 2025 में इंदौर के सुमति धाम में, आचार्य विशुद्ध सागर महाराज के पट्टाचार्य महोत्सव के अवसर पर हुआ था। आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज को आचार्य बने 40 वर्ष हो चुके हैं। आचार्य प्रसन्न ऋषि महाराज 29 वर्ष पूर्व आचार्य बने थे। जबकि आचार्य विप्रणत सागर महाराज को हाल के वर्षों में आचार्य की उपाधि प्राप्त हुई है। तीनों आचार्यों के दिव्य दर्शनों के लिए हजारों समाजजन बावनगजा पहुंचे हैं। वार्षिक मेले के दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर इस दुर्लभ सानिध्य का लाभ लेंगे।


