भास्कर एक्सपर्ट परीक्षा का दबाव अब बच्चों में साफ तौर पर दिखने लगा है और यह केवल एग्जाम हॉल तक सीमित नहीं रह गया है। फाइनल परीक्षाओं से पहले ही शहर में ऐसे मामले सामने आने लगे हैं, जहां बच्चे जरूरत से ज्यादा घबराहट, बेचैनी और डर का सामना कर रहे हैं। मानसिक विशेषज्ञों के पास पहुंच रहे केस बताते हैं कि कई मामलों में बच्चे जवाब जानते हुए भी भूलने लगे हैं, रातों की नींद उड़ रही है और भूख तक कम हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यही वह दौर है, जब पेरेंट्स को फाइनल एग्जाम का इंतजार करने के बजाय पहले ही स्थिति को संभालने की जरूरत है। समय रहते बच्चों के व्यवहार में हो रहे बदलावों को पहचान लिया जाए और उन्हें भावनात्मक सहारा दिया जाए, तो एग्जाम फोबिया को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है। एग्जाम फोबिया औसत और हाई-परफॉर्मिंग दोनों तरह के बच्चों को प्रभावित करने लगा है। संकेत नजरअंदाज न करें {बोर्ड परीक्षा से पहले बच्चे में लगातार रैंक खोने का डर दिखे। {ज्यादा सोच और चिंता में नींद 4-5 घंटे रह जाए। {मॉक टेस्ट के दौरान हाथ कांपना, पसीना आना, दिल की धड़कन तेज होने, सांस फूले। डॉ. संदीप गोयल, मनोचिकित्सक बच्चों की ताकत, कमजोरी पहचानें केस 1 – आत्मविश्वास से चिंता तक परीक्षा का दबाव छात्र को तोड़ रहा : दसवीं क्लास एक छात्र, जो अब तक क्लास में आत्मविश्वासी रहता है, परीक्षा पास आते ही लगातार चिंता में रहने लगा है। पहले बिना झिझक पढ़ाई और सवालों में हिस्सा लेने वाला बच्चा अब बार-बार फेल होने की बात करने लगा है। घबराहट में जवाब जानते हुए भी वह ठीक से लिख नहीं पा रहा। काउंसलिंग में सामने आया है कि माता-पिता की अपेक्षाएं और खुद से की जा रही तुलना का दबाव उसके आत्मविश्वास पर असर डाल रहा है।केस 2: टॉपर बनने, परीक्षा का दबाव छात्रा की नींद और संतुलन छीन रहा : बारहवीं क्लास की 17 साल की एक छात्रा, जो अब तक पढ़ाई में टॉपर रही है, बोर्ड परीक्षा पास आते ही लगातार दबाव में रहने लगी है। माता-पिता की ऊंची अपेक्षाएं उसके लिए बोझ बन रही हैं और रैंक खोने का डर उसे लगातार परेशान कर रहा है। इसी दबाव में वह देर रात तक पढ़ाई करती है और फिर मोबाइल पर समय बिताती है, जिससे नींद घटकर चार से पांच घंटे रह गई है। मॉक टेस्ट के दौरान उसके हाथ कांपने लगते हैं। पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों पर अपने लक्ष्य न थोपें और उनकी तुलना दोस्तों या भाई-बहनों से न करें। तुम कर सकते हो, जैसे सकारात्मक शब्द बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। पढ़ाई के लिए धमकी देने से डर बढ़ता है। परीक्षा के समय नींद पूरी होना बेहद जरूरी है, इसलिए मोबाइल, स्क्रीन टाइम सीमित रखें। अगर बच्चे में लगातार घबराहट, नींद की कमी, पेट दर्द या पैनिक जैसे लक्षण दिखें, तो स्कूल काउंसलर या मानसिक विशेषज्ञ से समय पर मदद लें। सही समझ, भावनात्मक सहारा और जादू की झप्पी बच्चों को एग्जाम फोबिया से बाहर निकाल सकती है। दो केस, एक सच : एग्जाम फोबिया की असली तस्वीर


