दिव्यांग दंपती को समूह से मदद मिलने पर आर्थिक समृद्धि आई, एक बेटी बनी सीएचओ

भास्कर संवाददाता | बड़वानी एक विकलांग दंपती ने संघर्ष कर स्वयं के साथ पूरे परिवार को आत्मनिर्भर बनाया। यह कहानी है अमलाली गांव की लीला नरगांवे व देवराम नरगांवे की। जिन्होंने विकलांग व अनपढ़ होने के बाद भी परिवार को समृद्ध बनाया है। लीला नरगांवे ने बताया मैं व मेरे पति दोनों विकलांग हैं। हमारे पास ढाई एकड़ सूखी भूमि है, जिस पर परिवार निर्भर था। विकलांग होने से हमें मजदूरी नहीं मिलती थी। बच्चों को मजदूरी करने जाना पड़ता था। वे स्कूल नहीं जा पाते थे। तभी गांव में आजीविका मिशन की टीम ने बैठक ली। जिसमें स्वयं सहायता समूह गठन कर प्रबंधन व संचालन की जानकारी दी। इसमें समूह के माध्यम से 25-25 रुपए साप्ताहिक बचत करने की योजना बनाई। जिसके बाद व्यापार के लिए चर्चा की। समूह के बचत खाते थे। 10 हजार रुपए का ऋण लेकर किराना दुकान खोली। रोजाना 100 से 200 रुपए का लाभ होने लगा। इस कमाई से ऋण चुकाया। कमाई बढ़ाने के लिए आटा चक्की के लिए 1 लाख 55 हजार रुपए योजना में ऋण लिया। 52 हजार रुपए का अनुदान मिला। रोज एक हजार रुपए तक कमाई होने लगी। वर्तमान में वह 30 से 35 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रही है। लीलाबाई लखपति दीदी की श्रेणी में शामिल है। परिवार की आर्थिक तंगी कम होने पर बच्चों की पढ़ाई शुरू कराई। सबसे बड़ी लड़की रोशनी बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर जनवरी 2025 में अशोक नगर के स्वास्थ्य केंद्र पर सीएचओ के पद पर चयनित हुई। दूसरी लड़की किरण इंदौर में रहकर नीट की तैयारी कर रही है। वहीं तीसरी लड़की आशा 11वीं की पढ़ाई कर रही है। पिछले दिनों उन्होंने बिजासन गांव में एक मसाले की चक्की भी डाली है।

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