दोनों पैर 99% कटे, सोचा सुसाइड कर लूं:लोग मदद करते तो लगता दया कर रहे; सेकेंड हैंड धनुष लेकर पैरालिंपिक की तैयारी शुरू की

2017 में ट्रेन से उतरते हुए अचानक स्लिप हुआ और ट्रेन के नीचे आ गया। दोनों पैर काटने पड़े। डेढ़ साल तक बिस्तर पर रहा। बिना किसी की सहायता के कोई काम नहीं कर सकता था। जब भी अकेला होता तो चादर से मुंह ढक कर खूब रोता था। फिर ख्याल आते ही ऐसे घुट-घुट के जीने से अच्छा है कि सुसाइड कर लूं। जब भी सुसाइड के बारे में सोचता तो परिवार का ख्याल आता कि जब ये लोग मुझे हिम्मत दे रहे हैं तो मैं क्यों हार मान लूं। जीने की सोची तो जॉब करने लगा। तब भी ऐसा महसूस होता कि वर्कप्लेस और पब्लिक मुझे दया की भावना से देखती है। इसके बाद मुझे सड़क पर क्रॉस करते हुए कोच मिले, उन्होंने मुझे मोटिवेट किया और पैरों से निशाना लगा लेने वाली पैरालिंपियन (आर्चरी) शीतल देवी का वीडियो दिखाया। जब पहली बार मैंने निशाना लगाया तो वो सटीक लगा। इसके बाद मैंने जैसे-तैसे सेकेंड हैंड धनुष खरीद कर पैरा खेलों की तैयारी शुरू की। दैनिक भास्कर में पढ़िए कोटा के 33 साल के राहुल वर्मा की कहानी जो 11 जनवरी को जयपुर में होने वाले पैरा नेशनल में खेलेंगे- राहुल कहते हैं कोच बृजपाल सिंह की मदद से 6 महीने में मैंने खुद को 50 मीटर आर्चरी गेम के लिए तैयार किया है। जयपुर के SMS स्टेडियम में 11 जनवरी को पैरा नेशनल गेम्स होंगे। 8 जनवरी को आर्चरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मेडिकल के लिए जयपुर बुलाया था। मैं गेम में 80% प्लस पैरा कैटेगरी में खेलूंगा। डॉक्टर ने कहा- दोनों पैर काटने पड़ेंगे राहुल ने बताया- 2002 में ईसरदा गांव से माता-पिता कोटा आ गए थे। हम चार भाई हैं, मनीष, रोहित, करण और मैं। हम पहले कोटा के प्रेम नगर इलाके में किराए के एक कमरे में रहने लगे थे। माता-पिता दोनों ही मजदूरी करते थे। उन्होंने जैसे-तैसे हमारे लिए एक मकान प्रेम नगर में ही बनवाया। 2011 में बड़े भाई मनीष की शादी कर दी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। मैं अपने भाइयों के साथ प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाया करता था। राहुल ने बताया- साल 2017 में अपने गांव ईसरदा गया था। वहां से लौटते समय डकनिया रेलवे स्टेशन पर चलती ट्रेन से उतरने लगा तो ट्रेन की चपेट में आ गया। लंबा इलाज चला और डॉक्टर ने कहा कि मेरे दोनों पैर काटने पड़ेंगे। मैं कभी ठीक नहीं हो पाऊंगा न ही पहले की तरह चल पाऊंगा। इस इलाज में डेढ़ साल बेड रेस्ट पर था। बिस्तर पर लेटे-लेटे सुसाइड के ख्याल आते थे राहुल ने बताया- बिना पैरों के ऐसा लगा कि जीवन ही खत्म हो गया। मन में सुसाइड के भी ख्याल आते थे। डेढ़ साल लगा सही होने में। बिस्तर पर रहा, मां सेवा करती तो लगता जवान लड़का होते हुए मुझे सहारा लेना पड़ रहा है। घर छोटा है, रोने के लिए जगह नहीं है, चादर में मुंह डालकर अपने भाग्य को कोसता था। लगता सुसाइड कर लूं। फिर सबके बारे में सोच कर रुक जाता। इसके बाद 2019 में मां को कैंसर की बीमारी हो गई और वो भी गुजर गई। मां की मौत के बाद परिवार पूरा टूट गया। ऐसा लग रहा था कि भगवान परीक्षा ले रहा है। मां के जाने के बाद जिम्मेदारी ओर बढ़ गई थी। अपने आप को सभाला फिर काम ढूढने निकला तो मैस में सब्जी काटने का काम मिला। पिता भी मजदूरी करते थे। लेकिन, उन्हें दिखाई कम देने लगा तो उन्हें मजदूरी करना छोड़नी पड़ी अब घर पर ही रहते हैं। छोटे भाई को पढ़ा रहे राहुल राहुल ने बताया- सबसे बड़ा भाई मनीष अलग किराए से रहता है। वो पीओपी लगाने का काम करता है। मैं छोटा भाई मनीष (22) उसकी वाइफ एक बच्चा और छोटा भाई करण, पिता रामफूल वर्मा हम सभी साथ रहते हैं। मैं पढ़ नही पाया पर अपने सबसे छोटे भाई करण (14) को पढ़ाई करवा रहा हूं। वो अभी 9वीं क्लास में पढ़ रहा है। मैंने आठवीं तक पढ़ाई की है। राहुल कहते हैं- बृजपाल सर (कोच) मेरे ही घर के पास रखते हैं, उन्होंने एक मुलाकात के दौरान मुझसे मेरे एक्सीडेंट के बारे में बात की थी। उन्होंने मुझे बिना हाथ के पैरालिंपिक में कमाल करने वाली शीतल देवी का वीडियो दिखाया। वो भी तीरंदाज हैं। उन्हें देख कर मेरा भी मनोबल बढ़ा और मैंने शुरुआत की। रेस्टोरेंट से फ्री होकर करते हैं प्रैक्टिस राहुल ने बताया- मैं केशवपुर में एक रेस्टोरेंट पर काम करता हूं। यहां मुझे 10,000 रुपए वेतन के तौर पर देते हैं। मैं यहां सब्जी काटने जैसे छोटे-मोटे काम कर लेता हूं। टूर्नामेंट नजदीक थे तो रेस्टोरेंट संचालक ने मुझे 15 दिन की छुट्टी दी थी। प्रैक्टिस करने के लिए और अन्य दिन मुझे 4 बजे तक रेस्टोरेंट से फ्री कर देते थे। 4 बजे बाद में तीरंदाजी की प्रैक्टिस करता। जुगाड़ कर सेकेंड हैंड धनुष लाए राहुल बताते हैं- मेरा सपना है कि ओलिंपिक में इंडिया के लिए मेडल लेकर आऊं। तीरंदाजी का धनुष तीर और इसके इक्विपमेंट काफी महंगे आते हैं। अभी जिस धनुष से प्रैक्टिस करता हूं वह डेढ़ से दो लाख रुपए का है, इसे मिलने-जुलने वाले लोगों की मदद से सेकेंड हैंड खरीदा है। अब जिस दिन कोच सर बृजपाल सिंह से मिला था तब उन्होंने बताया था कि इस खेल के इक्विपमेंट बहुत महंगे हैं। ऐसे में, पहले कुछ दिन तो मैंने एकेडमी में आने वाले खिलाड़ियों का धनुष लेकर निशाने लगाए। जब मैंने पहला निशाना लगाया तो बेहद डर रहा था। हाथ कांप रहे थे। लेकिन पहले ही निशाने में बुल्स आई को हिट किया तो मेरा जोश बढ़ गया। इसके बाद सर ने लोगों की सहायता से मेरे लिए एक सेकेंड हैंड धनुष का इंतजाम किया। मैं खाना बनाने का काम करता हूं। ऐसे में मेरी बचत के 20 हजार मैंने भी दिए। इसके बाद अपनी प्रैक्टिस में जुट गया। मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था। 95% निशाने ठीक श्रीपंच मुखी तीरंदाजी एकेडमी के कोच बृजपाल सिंह सोलंकी ने बताया कि मैंने 15 दिनों में एक खिलाड़ी (अरविंद सेन) को पैरा खिलाड़ी को तैयार कर नेशनल खेलने भेजा था। अब वो जयपुर में ट्रेनिंग करता है। राहुल मुझे 6 महीने पहले प्रेम नगर इलाके में देखा। दोनों पैर नहीं थे पर इसकी बॉडी फिट थी तीरंदाजी गेम के लिए तो मैंने उसे मोटिवेट किया। कोच ने कहा- तुम्हारे हाथ तो हैं कोच बृजपाल सिंह सोलंकी ने बताया- मैंने सबसे पहले राहुल को शीतल का वीडियो दिखाया। वो बिना हाथों के पैरों से निशाना लगा लेती है। मैंने उसे बताया कि वह बिना हाथ के धनुष चला सकती है तुम्हारे तो हाथ है। वह पिछले 6 महीनों से ट्रेनिंग ले रहा है। राहुल कंपाउंड धनुष से खेलेगा और इसमें 50 मीटर पर निशाना लगाएगा और पूरे गेम में 36 तीर चलाए जाएंगे। हर एक पेयर के पॉइंट 10 होते हैं। टोटल स्कोर 360 में से जो सबसे अच्छा स्कोर करेगा। वहीं खिलाड़ी आगे अपनी गेम में बढ़त करेगा। राहुल अभी प्रैक्टिस के दौरान ग्राउंड में 360 में से 335 प्लस ही बुल्स आई हिट करता है।

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