1922 में बनी गंगनहर की लागत 8 करोड़ थी। तब धनाभाव में बीकानेर-जैसलमेर तक नहर की योजना आगे नहीं बढ़ सकी। जब आजादी के बाद इस नहर का निर्माण शुरू हुआ तो बजट एस्टीमेट 6929.38 करोड़ का रखा गया। मगर 500 किलोमीटर नहर के निर्माण के बाद प्रोजेक्ट रोक दिया गया। लागत थी 3000 करोड़ रुपए। मगर इस लागत ने राजस्थान को बदले में जो दिया वह अनमोल है। नहरी पानी ने मरुधरा की सूरत और किस्मत दोनों बदल दी। आज इस नहर पर सालाना राज्य सरकार 500 से 700 करोड़ तक खर्च करती है। इसमें 460 करोड़ तो सिर्फ वेतन आदि का बजट है। जबकि फायदे का आकलन करें तो नहरी पानी से सिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले अनाज की कीमत ही 15000 करोड़ से ज्यादा है। इसके दूसरे फायदों का तो मोल ही नहीं लगाया जा सकता। साल में 15 हजार करोड़ की कमाई का आंकलन भी इंदिरा गांधी नहर विभाग ने तमाम इकोनोमिस्ट की एक कमेटी बनाकर करवाया और कमाई से लेकर खर्चे के ये आंकड़े सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं। चीफ इंजीनियर अक्सर इन आंकड़ों का प्रजेंटेशन देकर ही इंदिरा गांधी नहर की महत्ता बताते हुए बजट की मांग भी करते हैं। ये है नहर से आए बदलाव की कहानी {40 नए शहर बस गए { 3000 से ज्यादा नई ग्राम पंचायतें बस गई। { 1500 से ज्यादा गांव को पानी मिल रहा { 1.46 लाख हेक्टेयर में वन क्षेत्र लहलहा रहा { 10 से ज्यादा विवि खुले आबादी बसने के बाद { 02 करोड़ से ज्यादा पशु संपदा नहर पर निर्भर { सूरतगढ़, बीकानेर समेत कई थर्मल पावर और ऊर्जा उत्पादन केन्द्र खुले { पीओपी समेत तमाम इंडस्ट्री पनपी, बीकानेर पूरी दुनिया में भुजिया के लिए जाना गया { सीमा पर सैनिकों की बुझ रही प्यास गंगनहर: नहरी पानी ने मरुधरा की सूरत और किस्मत दोनों बदल दी


