निहंग छावनी: यहां शस्त्र के साथ घुड़सवारी भी सिखा रहे

सिखों के दसवें गुरु और खालसा पंथ के संस्थापक गुरुगोबिंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव पर आपको सिखों के अनूठे स्कूल से रूबरू करवाते हैं। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के 8 ए गांव में स्थित इस स्कूल में घुड़सवारी, तलवारबाजी व गतके की िशक्षा नि:शुल्क दी जाती है। यहीं पर तैयार होती है गुरु गोबिंद सिंह की लाडली फौज। इनके सिर पर पगड़ी, चक्रतोला और कलगी होती है। नीली दस्तार। कमर से बंधा केसरिया सिरोपा, हाथों में दुमाला, खंडा, बरछा या तलवार। कुछ ऐसे ही सज-धजकर घोड़े पर सवार होकर निकलती है ये फौज। इनकी भाषा भी जंगी होती है। ये निहंग सिख भी कहलाते हैं। इस स्कूल में 12 वर्ष में 500 सिख युवक ट्रेनिंग ले चुके हैं और अब वे अलग-अलग मौकों पर देश के गुरुद्वारों में शौर्य का प्रदर्शन करने जाते हैं। यहां नि:शुल्क शिक्षा देने का जिम्मा शहीद बाबा सुखासिंह व बाबा मेहताब सिंह संस्था पर है। इन स्कूलों को निहंग छावनी भी कहा जाता है। प्रदेश की यह इकलौती छावनी है, जहां गतके के साथ घुड़सवारी की भी शिक्षा देते हैं। निहंगों की शब्दावली { निहंगों की अपनी खास बोली होती है। दरअसल, गुरु गोबिंद सिंहजी की फौज मुगलों पर आक्रमण के लिए योजना बनाती, लेकिन योजना लीक हो जाती थी और उनकी फौज हार जाती। इसका तोड़ निकालने के लिए निहंग सिखों ने अपनी शब्दावली तैयार की। इनमें 600 से ज्यादा शब्द हैं। निहंग सिख की फौज कुछ ऐसे ही सज-धजकर घोड़े पर सवार होकर निकलती है। यहां 12 वर्षों में 500 सिख युवक ट्रेनिंग ले चुके हैं। छावनी में चर्चा करते सिख युवक। राजस्थान के 8 ए गांव स्थित इस निहंग छावनी में गतके की ट्रेनिंग लेते सिख युवक। {मर्यादा; घोड़े पर नंगे पैर ही ​बैठते हैं, रात एक बजे उठकर सबसे पहले उन्हीं की सेवा: जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह ने बताया कि एक निहंग की जिंदगी में घोड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मर्यादा बनाए रखने के लिए हमेशा घोड़ों पर नंगे पैर ही चढ़ते हैं। रात में एक निहंग सिख ​​हमेशा घोड़ों के पास रहता है। अमृत वेला में रात 1 बजे सबसे पहले घोड़ों की ही सेवा करते हैं। {दीक्षा; हर निहंग सिख को देते है ग्रंथों की दीक्षा: बलवीरसिंह बताते हैं कि पिछले 12 साल में यहां काफी निहंग गतके, घुड़सवारी व ग्रंथों की दीक्षा ले चुके हैं। एक निहंग सिख हर आपदा के लिए भी तैयार रहता है। जहां निहंग सिख रहते हैं, उसे निहंग छावनी कहते हैं। हम एक जगह नहीं रहते, इस वजह से हमें चक्रवर्ती भी कहा जाता है। {लाडली फौज; 1699 में पंज प्यारों को बाणा-बाणी दी, जो इन्हें संभाले… वही निहंग: गुरु गोबिंद सिंह जी ने बैसाखी के दिन 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उस वक्त उन्होंने पंज प्यारों को अपना बाणा-बाणी देते हुए कहा कि निहंग सिख वही, जिन्होंने बाणा-बाणी को संभाल कर रखा। इन्हें ही गुरु की लाडली फौज कहा जाता है। इतिहास में मुगलों और अंग्रेजों के साथ कई लड़ाइयों में निहंगों की शौर्य गाथाएं देखने को मिलती हैं। रांची, सोमवार, 06 जनवरी, 2025 | 13

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