रांची सदर अस्पताल में मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने में भारी गोरखधंधा हो रहा है। न कोई जांच और न मरीज की जरूरत, बस 300 रुपए दीजिए और आधे घंटे में दिव्यांग और गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के भी पूरी तरह से फिट होने का सर्टिफिकेट मिल जाएगा। जबकि किसी भी व्यक्ति को मेडिकल सर्टिफिकेट जारी करने से पहले ब्लड टेस्ट, ब्लड प्रेशर, आंखों की जांच सहित कई परीक्षण अनिवार्य होता है। फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने की सूचना पर भास्कर सदर अस्पताल पहुंचा। वहां कर्मचारी से बात की। बताया कि उन्हें सर्टिफिकेट चाहिए। उसने 300-300 रुपए मंागे। फिर एक नेत्रहीन और एक चलने-फिरने में पूरी तरह से असमर्थ व्यक्ति को पूरी तरह से फिट होने का सर्टिफिकेट जारी कर दिया। वह भी 30 मिनट में। यही हाल सिविल सर्जन कार्यालय का भी है। वहां चपरासी को इस काम के लिए लगा रखा है। वहां 1000 रुपए में बिना जांच के सर्टिफिकेट जारी किया जा रहा है। भास्कर ने कुल सात ऐसे सर्टिफिकेट बनवाए। इस पूरे लेनदेन का वीडियो फुटेज भास्कर के पास मौजूद है।
आधे घंटे में मिल जाएगा… आखिर पैसे किसलिए दे रहे हैं
रिपोर्टर : एक मेडिकल सर्टिफिकेट बनाना है? गार्ड : कब चाहिए? रिपोर्टर : आज ही, कॉलेज में देना है। गार्ड : 3-4 दिन लगेंगे। रिपोर्टर : कल मिल सकता है? गार्ड : 300 रुपए लगेंगे। रिपोर्टर: कब तक मिलेगा? गार्ड : आधे घंटे में। रिपोर्टर : और जांच…? गार्ड : मुस्कुराते हुए…पैसे किस लिए दे रहे हैं। प्रमाण दीजिए…तत्काल कार्रवाई करेंगे कर्मचारी अशोक मुंंडा रिपोर्टर व सिविल सर्जन ऑफिस के कर्मी में बातचीत कुसुम मिंज (बदला हुआ नाम) सोहन दास (बदला हुआ नाम) भास्कर रिपोर्टर और सिक्योरिटी गार्ड अमन कुमार में बातचीत रिपोर्टर : मेडिकल सर्टिफिकेट बनाना है? कर्मचारी : किसलिए? रिपोर्टर : सरकारी नौकरी लगी है, वहीं देना है। कर्मचारी:जेएसएससी वाला? रिपोर्टर : हां, वही। कर्मचारी : कुछ दिन पहले आपके साथी लोगों को भी बना कर दिया है। रिपोर्टर : अच्छा। कर्मचारी : 1000 रु. दीजिए। रिपोर्टर : कुछ कम कीजिए। कर्मचारी : गलत नहीं मांग रहे, सबसे वही लिए हैं। पैसे मेडिकल ऑफिसर तक भी जाता है। रिपोर्टर : ठीक है, लीजिए, कब तक मिलेगा? कर्मचारी : एक घंटे में घूमकर आइए, मिल जाएगा। 16 साल का सोहन दास जन्मजात नेत्रहीन है। मेडिकल अथॉरिटी ने उसे जो सर्टिफिकेट दिया है, उसके अनुसार उसकी दोनों आंखें सामान्य से बहुत छोटी है। मेडिकल भाषा में इसे माइक्रोपैथेलिमिया कहा जाता है। लेकिन सदर अस्पताल ने जो सर्टिफिकेट जारी किया, उसके अनुसार उसकी आंखें 6/6 यानी सामान्य हैं। 29 साल की कुसुम मिंज लोकोमोटर डिसएबिलिटी की शिकार है, यानी वह शारीरिक रूप से पूरी तरह अक्षम है और चलने-फिरने में भी असमर्थ है। मेडिकल अथॉरिटी ने उसे यही सर्टिफिकेट जारी किया है। लेकिन सदर अस्पताल ने 300 रुपए लेकर उसे पूरी तरह से फिट होने का सर्टिफिकेट दे दिया।


