पंघूड़े में मिले हाइड्रोकेफेलस पीड़ित बच्चे की हालत नाजुक, नहीं हुई सर्जरी

गुरु नानक देव अस्पताल (जीएनडीएच) के कुछ गलियारे ऐसे भी हैं, जहां हर महीने एक ऐसी कहानी जन्म लेती है, जो दिल को झकझोर देती है। यहां लगभग हर महीने कोई न कोई नवजात बच्चा लावारिस हालत में छोड़ दिया जाता है। न कोई पहचान, न कोई नाम और न ही कोई जवाब कि आखिर इन मासूमों का कसूर क्या था। अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक पिछले 3 साल में जीएनडीएच में करीब 30 लावारिस बच्चे मिले हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें से केवल एक ही मेल चाइल्ड था, जबकि बाकी सभी बच्चियां थीं। यह आंकड़ा अपने आप में समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जहां आज भी बेटी का जन्म कई परिवारों के लिए बोझ समझा जाता है। एमएस डॉ. करमजीत सिंह के मुताबिक अधिकतर मामलों में बच्चे को प्रसव के कुछ घंटों या दिनों बाद अस्पताल के किसी कोने,बॉ शरूम के पास या इमरजेंसी वार्ड के बाहर छोड़ दिया जाता है। कई बार नर्सिंग स्टाफ को देर रात किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती है और जब खोजबीन होती है तो वहां एक कपड़े में लिपटा नवजात मिल जाता है। इन मासूमों के साथ कुछ दिन अस्पताल का स्टाफ ही उनका परिवार बन जाता है। नर्सें उन्हें गोद में लेकर सुलाती हैं। डॉक्टर उनकी सेहत की जांच करते हैं और वार्ड बॉय उनके लिए दूध और कपड़ों का इंतजाम करते हैं। लेकिन यह अपनापन ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाता। कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चों को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के हवाले कर दिया जाता है, जहां से आगे गोद लेने की प्रक्रिया शुरू होती है।

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