प्रदेश के एकमात्र शासकीय डेंटल कॉलेज इंदौर में प्राचार्य का एक ही पद है। नियमों के अनुसार जब एक ही पद हो तो वहां पदोन्नति में आरक्षण रोस्टर की बाधा नहीं आती। इसलिए सरकार को भी इस पद पर भर्ती करने में कोई परेशानी नहीं है। इसके बावजूद आठ साल से प्रभारी प्राचार्य के भरोसे ही व्यवस्था चल रही है। हाल ही में प्रो. अलका गुप्ता को प्रभारी प्राचार्य बना दिया, जिसके बाद से विवाद बढ़ गया। मामला हाई कोर्ट में गया। 20 जनवरी को सुनवाई होगी। इधर, बताते हैं वर्ष 2016 के बाद से सरकार ने नियमित प्राचार्य नहीं बनाया। 2016 से ही पदोन्नति पर रोक है। सवाल यह उठ रहा कि प्राचार्य के पद पर पदोन्नति में कोई बाधा नहीं है, क्योंकि यह एक ही पद है, तो इस पर स्थायी नियुक्ति क्यों नहीं की जा रही। जहां पदों की संख्या ज्यादा हो, वहां आरक्षण रोस्टर नियमों का पालन करना पड़ता है। पूर्व में चार प्राचार्यों का कार्यकाल रहा। वैसे डेंटल कॉलेज में इस तरह के विवाद पहले भी सामने आए हैं, लेकिन इस बार जूनियर व सीनियर को प्राचार्य बनाए जाने को लेकर विवाद है। 2016 के बाद व्यवस्था बदली इधर, हाई कोर्ट में अगली सुनवाई में स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। 2016 से पहले प्राचार्य व डीन की भर्ती पदोन्नति से होती थी, उसके बाद व्यवस्था बदली। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में भी डॉ. आरके माथुर और डॉ. शरद थोरा प्रभारी डीन रहे हैं। डेंटल कॉलेज में डॉ. सुभाष गर्ग और डॉ. देशराज जैन प्रभारी प्राचार्य रहे। इस बीच वर्ष 2018 में सरकार ने ऑटोनॉमस सोसायटी के नए नियम बनाए। स्वशासी संस्था के स्तर पर डीन के इंटरव्यू लिए गए। डॉ. ज्योति बिंदल उस इंटरव्यू के माध्यम से डीन बनीं। अब चूंकि डेंटल कॉलेज में प्राचार्य का एक ही पदोन्नति का पद है। ऐसे में एकल पद में कोई बाधा नहीं होना चाहिए।


