पाकुड़ जिले में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का आयोजन उल्लास के साथ किया गया। रुक-रुककर हो रही बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं ने अपने नजदीकी मंदिरों में जाकर भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की। राजा पाड़ा स्थित मदन मोहन मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी। भक्तगण स्नान कर नए वस्त्र धारण करके मंदिर पहुंचे। पुरोहित ने विधि-विधान से भगवान मदन मोहन की पूजा-अर्चना की। शुभ मुहूर्त में भगवान की प्रतिमा को कालीबाड़ी मंदिर में रखे पीतल के रथ पर विराजमान किया गया। ढोल-नगाड़ों की धुन पर भक्त झूमते रहे भक्तों ने जयकारे लगाए और भगवान को पान, बताशा, लड्डू तथा विभिन्न फल अर्पित किए। हल्की बारिश के बीच ढोल-नगाड़ों की धुन पर भक्त झूमते रहे। शाम को कालीबाड़ी मैदान में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र हुए। रथ यात्रा शहर के विभिन्न चौक-चौराहों से होते हुए कालीबाड़ी मैदान पहुंची। भगवान मदन मोहन को उनके मासी बाड़ी में विराजमान कराया गया। पुरोहित ने विधि-विधान से संध्या आरती की और प्रसाद वितरण किया गया। परंपरा के अनुसार, रथ यात्रा के दिन भगवान मदन मोहन सात दिनों के लिए अपनी मौसी के घर जाते हैं। सात दिन बाद जब वे वापस लौटते हैं, तब उल्टा रथ यात्रा का आयोजन होता है। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की गई। एक महीने तक चलने वाले मेले में भारी भीड़ उमड़ती है पाकुड़ शहर की रथ यात्रा की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। मुगल सम्राट अकबर द्वारा पाकुड़ को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद आदिम जनजाति पहाड़िया राजा ने रथ यात्रा की शुरुआत की। राजा कुमार कालिदास के शासनकाल में यह यात्रा राजसी ठाठ से निकलती थी। रानी ज्योतिर्मयी ने पीतल का एक विशेष रथ बनवाया था, जिस पर भगवान मदन मोहन की सवारी निकलती थी। वर्तमान में भी रथ यात्रा पूरे भक्तिभाव के साथ निकलती है। इसमें पाकुड़ के साथ-साथ पश्चिम बंगाल से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं। रथ मेला मैदान में लगभग एक महीने तक चलने वाले मेले में भारी भीड़ उमड़ती है। मेला में आम कटहल और जलेबी की जमकर बिक्री होती है


