एजुकेशन रिपोर्टर|रांची झारखंड में विश्वविद्यालय शिक्षकों के प्रोफेसर प्रमोशन का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। यूनिवर्सिटी शिक्षकों ने कहा कि वर्ष 2015 के एक पुराने सरकारी पत्र का हवाला देते हुए विश्वविद्यालयों की प्रोन्नति प्रक्रिया में अड़चन डाला जा रहा है, ताकि एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर पद के पद प्रमोशन देने के लिए शुरू किया गया प्रोसेस लटक जाए। दरअसल, 2015 में उच्च शिक्षा विभाग ने एक निर्देश जारी कर विनोबा भावे विश्वविद्यालय (वीबीयू) हजारीबाग और सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (एसकेएमयू), दुमका को 2008 में नियुक्त शिक्षकों को बिना जेपीएससी की सहमति 6000 से 7000 ग्रेड पे देने से रोक दिया था। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा इस बढ़ोतरी पर रोक लगा दी गई थी। कुछ शिक्षक इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट भी गए, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली थी। जबकि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में इस बैच के असिस्टेंट प्रोफेसर पुराने ग्रेड-पे में ही सेवा दे रहे थे। अब शिक्षकों का आरोप है कि जेपीएससी उसी पत्र को आधार बनाकर पूरे राज्य के विश्वविद्यालयों में रीडर और सेलेक्शन ग्रेड से प्रोफेसर बनने की प्रक्रिया को रोकना चाह रहा है। 1. शिक्षा विशेषज्ञों और वरिष्ठ शिक्षकों का कहना है कि यह पूरा विवाद गलत व्याख्या पर आधारित है। 27 जुलाई 1998 से लागू विश्वविद्यालय स्टैच्यूट में रीडर/सेलेक्शन ग्रेड में प्रोन्नत शिक्षकों को तीन साल बाद स्वतः उच्च वेतनमान देने का प्रावधान है। 2. 20 नवंबर 2010 के उच्च शिक्षा विभाग के संकल्प में इस प्रावधान को मान्यता दी गई है। उस संकल्प में कहीं भी जेपीएससी की सहमति लेने की बात नहीं लिखी गई है। 3. शिक्षकों का कहना है कि जिस नियम को लेकर विवाद पैदा किया जा रहा है, वह केवल 6000 से 7000 ग्रेड पे के मामले में लागू होता था, जहां प्रोन्नति के लिए कुछ अतिरिक्त शर्तें निर्धारित थीं। 4. वहीं, 8000 से 9000 ग्रेड पे में अपग्रेडेशन, जिसके आधार पर शिक्षक प्रोफेसर पद के लिए योग्य बनते हैं, उसमें किसी प्रकार की शर्त निर्धारित नहीं है, खासकर उन शिक्षकों के लिए जिनकी रीडर प्रोन्नति 31 दिसंबर 2008 से पहले हो चुकी थी। दोनों की तुलना गलत ग्रेड पे 6000 से 7000 वाले मामले में जेपीएससी की अनुमति का प्रश्न आता था, जिसे लिया भी गया। लेकिन 8000 से 9000 ग्रेड पे में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं। इसलिए दोनों मामलों को समान मानकर कार्रवाई करना न केवल गलत है, बल्कि नियमों की गंभीर गलत व्याख्या है।


