यह खबर पुलिस की आला दर्जे की लापरवाही से ज्यादा दो बच्चों के एक साथ गायब होने की अथाह पीड़ा झेल रही मां लक्ष्मी के जज्बे और संघर्ष की है, जिसने अपने बच्चों को ढूंढ निकालने के लिए वह सबकुछ किया जो कि पुलिस और परिजनों के लिए नजीर है। समराला चौक के डाकघर के पास की यह घटना 8 दिसंबर की शाम की है। अभिषेक (12) और रितिक (8) घर से ट्यूशन के लिए चार बजे निकले थे। बच्चे देर शाम तक नहीं लौटे तो मां ने टीचर से संपर्क किया। वहां बच्चे पहुंचे ही नहीं थे। ऐसे में मां परिजनों के संग मिलकर देर रात तक दुकानदारों, राहगीरों और आम लोगों से तस्वीर दिखाकर पूछती रही कि मेरे बच्चों को कहीं देखा है क्या- हर जगह से जवाब आया नहीं। अगले दिन थाना डिवीजन-7 में जाकर शिकायत दर्ज करवाई। शुरुआत में तो पुलिस ने समराला चौक के आसपास लगे सीसीटीवी को देखा, पर बच्चे नहीं दिखे। चार दिन में पुलिस सुस्त पड़ गई। खैर, मां कहां थकने वाले थी। उसने नौ दिनों बाद अपने बच्चों को अमृतसर से ढूंढ निकाला। पुलिस के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार पर थाना डिवीजन-7 एसएचओ गगनदीप सिंह ने कुछ भी बोलने से मना कर दिया। पढ़िए मां के शब्दों में वह कैसे बच्चों लेकर आई। सीडब्ल्यूसी को बताया नहीं पुलिस पर कार्रवाई संभव ऐसे मामले को सीएनसीपी (चाइल्ड इन नीड ऑफ केयर एंड प्रोटेक्शन) के तहत देखा जाता है। बच्चे को लाने के लिए विशेष टीम बनाई जाती है। इसमें जांच अधिकारी, एक महिला पुलिस अधिकारी या कांस्टेबल और चाइल्ड वेलफेयर पुलिस ऑफिसर (सीडब्लूपीओ ) शामिल होते हैं। दूसरे शहर की पुलिस की मौजूदगी में बच्चे की पहचान की जाती है। फिर उसे चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) के सामने पेश किया जाता है। वह तय करती है, बच्चे को परिजनों को सौंपा जाए या बाल संरक्षण गृह भेजा जाए।जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015, बीएनएस और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन जरूरी है। यदि पुलिस कर्मी उल्लंघन करता है, तो उस पर विभागीय जांच, वेतन कटौती व निलंबन जैसी कार्रवाई हो सकती है। मुझे सीसीटीवी नहीं देखने देते थे लोग, वीडियो बनवाया और पोस्टर बांटे मन्नू पुरंग, क्रिमिनल एडवोकेट समराला चौक के पास से गुम हुए थे बच्चे, पुलिस ने तलाशने में की लापरवाही, पता चला तो लेने भी नहीं गई, कहा- जाओ खुद ले आओ मैं बच्चों की तलाश में भटकती रही। इसी दौरान एक सीसीटीवी में बस में बच्चे चढ़ते हुए दिख गए। मैं पुलिस के पास गई और कहा कि बच्चे अमृतसर की ओर गए हैं। मदद के लिए साथ चलो। तब पुलिस ने मना कर दिया। फिर मैं अपने जानकार दविंदर शर्मा बेट्टा की मदद से चार दिनों तक दो दर्जन से ज्यादा सीसीटीवी तलाशती रही। शर्मा ने एडीसीपी-4 जश्न गिल से फोन पर बात की, उसके बावजूद मदद के लिए कोई पुलिस कर्मी नहीं आया। मुश्किल से ही हमें लोग सीसीटीवी देखने देते थे। 100 से ज्यादा लोगों से बात की। इस बीच कई वीडियो भी बनवाकर वायरल कराया। पोस्टर बांटे। तभी अमृतसर पुलिस को दोनों बच्चे दरबार सहित के परिसर में घूमते मिले। फिर अमृतसर की पुलिस ने लुधियाना पुलिस से संपर्क कर बच्चों को लेकर जाने के लिए कहा, लेकिन यहां पुलिस कर्मी ने थाने बुलाकर कहा कि मेरे पास समय की कमी है, तुम अमृतसर जाओ, मैं वहां की पुलिस से बात कर लूंगा। तब मैं अपने पति के साथ अमृतसर गई और बच्चों को शनिवार को लेकर आई। -जैसा लक्ष्मी ने दैनिक भास्कर को बताया


