पुलिस से बोलीं बच्चियां-मर जाएंगे पर घर वापस नहीं जाएंगे:माता-पिता के बर्ताव की वजह से भागी, ‘ऑपरेशन मुस्कान’ के तहत घर लौटे 1900 बच्चे

जब हम बच्चियों को ढूंढ़कर लाते हैं, तो वे कहती हैं- ‘हमें घर नहीं जाना।’ माता-पिता शराब पीते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं और मारपीट करते हैं। जो प्यार उन्हें घर में नहीं मिलता, वे उसे बाहर ढूंढते हैं। ये कहते हुए एएसआई सुषमा सिंह सवाल पूछती है, ‘समाज कहता है कि लड़की प्रेम-प्रसंग में भाग गई, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि 12-14 साल की बच्ची को ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, सुषमा सिंह एमपी पुलिस के ऑपरेशन मुस्कान की अहम कड़ी हैं। वह अबतक कई गुमशुदा नाबालिग बच्चियों को तलाश कर उन्हें मां बाप को सौंप चुकी है। पुलिस हर साल इस अभियान के तहत गुमशुदा बच्चियों की तलाश करती है। इस बार 1 से 30 नवंबर तक चलाए गए ऑपरेशन मुस्कान के तहत पुलिस ने पूरे प्रदेश से 1900 बच्चियों को तलाश कर उन्हें घर पहुंचाया है। पुलिस ने जब इन बच्चियों से बात की तो पता चला कि ज्यादातर परिवार के माहौल से तंग आकर घर से भागी थी। संडे स्टोरी में पढ़िए आखिर पुलिस ने किस तरह से बच्चियों की तलाश की और पूछताछ में उन्होंने घर से भागने की कौन-कौन सी वजहें बताईं। पहले जानिए बच्चियों के घर छोड़ने या गायब होने की वजह 1. घर का तनावपूर्ण और हिंसक माहौल
भोपाल जोन-2 के डीसीपी विवेक सिंह का कहना है, ‘यह धारणा गलत है कि सिर्फ गरीब या आदिवासी परिवारों के बच्चे गायब होते हैं। कुल मामलों में से लगभग 40% बच्चे संपन्न परिवारों से होते हैं। गायब होने वाले बच्चों में 85% नाबालिग लड़कियां होती हैं। ज्यादातर मामलों की जड़ घर का तनावपूर्ण और हिंसक माहौल है।’ 2. पढ़ाई-लिखाई और जागरूकता की कमी
ASI सुषमा सिंह, जो 500 से ज्यादा ऐसे केस देख चुकी हैं, बताती हैं, ‘मजदूर माता-पिता अपने बच्चों को कंस्ट्रक्शन साइट्स पर ले जाते हैं, जहां उन्हें न शिक्षा मिलती है, न सुरक्षा। वहां दूसरे राज्यों से आए लोग बच्चियों को मीठे वादे करके फंसा लेते हैं और भगा ले जाते हैं।’ 3. समाज का दोहरा रवैया
सुषमा सिंह कहती हैं, “जब हम बच्चियों को ढूंढ़कर लाते हैं, तो वे कहती हैं- ‘हमें घर नहीं जाना।’ वे बताती हैं कि माता-पिता शराब पीते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं और मारपीट करते हैं। जो प्यार उन्हें घर में नहीं मिलता, वे उसे बाहर ढूंढ़ते हैं। समाज कहता है कि लड़की प्रेम-प्रसंग में भाग गई, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि 12-14 साल की बच्ची को ऐसा करने की ज़रूरत क्यों पड़ी। चार केस से समझिए घर से क्यों भागी बेटियां? मां-बाप रोज पीटते गालियां देते
15 साल की शुभांगी बताती है, मैं भोपाल की एक झुग्गी में रहती हूं। एक रात मम्मी ने मुझे मामा की लड़की को घर छोड़कर आने को कहा। मेरी तबीयत बहुत खराब थी, लेकिन मुझे जाना पड़ा। लौटते समय चक्कर आने से मैं सड़क किनारे बैठ गई और घर पहुंचने में आधा घंटा लेट हो गई। घर पहुंचते ही मम्मी-पापा ने मुझे पीटना और गालियां देना शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि मैं कोई गलत काम करके आ रही हूं। उस दिन के बाद से मेरे साथ रोज मारपीट होने लगी। इसी दौरान मेरी दोस्ती एक लड़के से हुई, जो मेरे घर के हालात जानता था। मैंने उसके साथ घर से भागने का फैसला किया। पुलिस ने हमें ढूंढ़कर वापस परिवार को सौंप दिया, लेकिन हालात और बिगड़ गए। मैं दो महीने बाद फिर भागी, लेकिन फिर पकड़ी गई। मैंने पुलिस को समझाया कि मुझे अपने दोस्त के साथ रहना है, पर उन्होंने नहीं सुना। आखिरकार, मैंने तीसरी बार भागकर उस लड़के से शादी कर ली। मम्मी ने बेवजह पीटा, मैं भाग गई
14 साल की मोना बताती है, ‘एक दिन मम्मी ने मुझे फोन पर एक लड़के से बात करते पकड़ लिया। उन्होंने बिना कुछ पूछे मुझे घर से बाहर खींचकर मारना शुरू कर दिया। मेरे चेहरे और हाथ पर चोट के निशान थे। मुझे बहुत बुरा लगा और मैं घर से भाग गई। मैं ट्रेन में बैठकर हैदराबाद पहुंची और वहां से दूसरी ट्रेन पकड़कर मदुरै चली गई, जहां कुछ लोगों ने मुझे कपड़ा फैक्ट्री में काम दिला दिया। मैं 8 महीने से वहीं काम कर रही थी। पुलिस के मुताबिक, मोना का कोई सुराग नहीं था। 8 महीने बाद जब उसे लगा कि सब सामान्य हो गया है, तो उसने इंस्टाग्राम पर अपनी एक फोटो पोस्ट की। उसके पुराने दोस्त ने फोटो देखकर पुलिस को सूचना दी। पुलिस जब उसे लेने पहुंची, तो उसने साथ आने से मना कर दिया। उसे वापस लाकर कुछ समय काउंसलिंग के बाद परिवार को सौंपा गया। परिवार का भावनात्मक सहयोग नहीं मिला
अच्छे और संपन्न घर से ताल्लुक रखने वाली 13 साल की चारु ने मां को बचपन में ही खो दिया था। मां के निधन के बाद घर में उसकी चाची उससे घर का सारा काम करवाती थीं। झाड़ू-पोंछा, बर्तन और खाना बनाने जैसे सारे काम करने के बावजूद, उसकी चाची का व्यवहार उसके प्रति बहुत खराब था। जब हालात असहनीय हो गए, तो चारु ने घर से भागने का फैसला किया। वह सोशल मीडिया पर बने अपने एक दोस्त के पास पहुंची और उससे कहा, ‘मुझे यहां से ले चलो, वर्ना मैं मर जाऊंगी।’ चारु की उस लड़के से पहले से बात होती थी और वह उसके घर के खराब माहौल के बारे में जानता था। चारु ने उसे साफ चेतावनी दी थी कि अगर उसने परिवार को कुछ बताया, तो वह आत्महत्या कर लेगी। वह लड़का उसे अपने मामा के घर जलगांव ले गया। कुछ दिनों बाद, चारु ने खुद ही अपने पिता से संपर्क किया, जिससे पुलिस को उसकी लोकेशन मिल गई। पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे जलगांव में ढूंढ निकाला। हालांकि चारु ने वापस आने से इनकार कर दिया, लेकिन अंततः उसे परिवार को सौंप दिया गया। जांच में किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न या ज्यादती की बात सामने नहीं आई, इसलिए उस लड़के को आरोपी नहीं बनाया गया। पड़ोसी ने ही बच्ची को बेचा
भोपाल में 9 साल की एक बच्ची को उसका पड़ोसी संतोष चॉकलेट दिलाने के बहाने अगवा कर ले गया। हैरानी की बात यह है कि वह परिवार के साथ बच्ची की गुमशुदगी की FIR लिखवाने भी गया। तीन दिन बाद जब वह खुद गायब हो गया, तो पुलिस को उस पर शक हुआ। जांच में पता चला कि उसने बच्ची को 30 हजार रुपए में राजगढ़ में बेचा था। राजगढ़ से उसे 1 लाख में धौलपुर बेच दिया गया, जहां 3 लाख में उसका सौदा तय हो चुका था। पुलिस ने सही समय पर पहुंचकर बच्ची को बचा लिया। इस केस में होशंगाबाद से 5-8 साल पहले गायब हुई कुछ और लड़कियां भी मिलीं, जिन्हें शादी के लिए बेचा गया था। अब उनके बच्चे भी हो चुके हैं और उन्होंने अपने पुराने परिवार के पास लौटने से इनकार कर दिया। अब जानिए कैसे काम करती है पुलिस?
पुलिस गुमशुदा बच्चों को ट्रैक करने के लिए इन तरीकों का इस्तेमाल करती है। भोपाल के बागसेवनिया के एसीपी डॉ. रजनीश कश्यप बताते हैं कि हर साल 1500 से लेकर 1900 बच्चों की तलाश करने का क्रेडिट थानों के बाल अधिकारियों और विवेचकों को जाता है, जो तकनीक का सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं। ऐसे सभी मामलों की एसीपी और डीसीपी स्तर पर निगरानी की जाती है, ताकि समय पर बच्चों को बरामद किया जा सके। बच्चियों के वापस लौटने पर काउंसलिंग बाल कल्याण के लिए काम करने वाली अर्चना सहाय बताती हैं,’बच्ची का मिलना पहली सफलता है, लेकिन हमारा काम यहीं खत्म नहीं होता।’ मनोचिकित्सक बोले- घर में सम्मान नहीं मिलता तो बाहर ढूंढते हैं
12 से 14 साल की लड़कियों के घर से भागने के पीछे क्या मनोविज्ञान है? इस सवाल का जवाब देते हुए गांधी मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक विभाग के एचओडी डॉ. जयप्रकाश अग्रवाल कहते हैं कि सबसे बड़ा कारण पारिवारिक कलह है। जब बच्चों को घर में प्यार और सम्मान नहीं मिलता, तो वे बाहर सहारा ढूंढते हैं। मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल ने इसे और आसान बना दिया है। बाहरी लोग उन्हें झूठे सपने दिखाते हैं और भावनात्मक रूप से अपरिपक्व होने के कारण वे आसानी से बहकावे में आ जाती हैं। वे कहते हैं कि 12 से 15 साल की उम्र में भावनात्मक परिपक्वता की कमी होती है। वे सही-गलत का अंदाजा नहीं लगा पातीं। घर के तनावपूर्ण माहौल से परेशान होने के कारण वे किसी के भी झूठे वादों पर भरोसा कर घर छोड़ देती हैं। अगली बार से माता-पिता को भी अभियान से जोड़ेंगे
इस पूरे अभियान का नेतृत्व करने वाले महिला सुरक्षा के स्पेशल डीजी अनिल कुमार ने बताया, ‘ऑपरेशन मुस्कान अभी बंद नहीं हुआ है, यह एक सतत प्रक्रिया है, क्योंकि नए मामले सामने आते रहते हैं। हालांकि, पिछले कुछ सालों की तुलना में गुमशुदगी की संख्या अभी सबसे कम है। इस ऑपरेशन से पहले, 2018 से लंबित 700 मामलों में भी कमी आई है।’ उन्होंने आगे कहा,’इस बार हमने बच्चों को खोजने के साथ-साथ उन्हें जागरूक करने पर भी ध्यान केंद्रित किया है। अगले साल से हम माता-पिता को भी इस अभियान से जोड़ने की योजना बना रहे हैं। अनिल कुमार बताते हैं कि जब बरामद बच्चियां घर जाने से मना करती हैं, तो बच्ची को अधिकतम 5 दिनों के लिए ‘वन-स्टॉप सेंटर’ में रखा जाता है। इस दौरान बच्ची और उसके माता-पिता, दोनों की काउंसलिंग की जाती है। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया के तहत अंत में बच्ची को उसके माता-पिता को ही सौंपना पड़ता है।

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