एक समय था जब लोग बेटों और बेटियों में भेदभाव करते थे, लेकिन अब समय बदल चुका है। लोग लक्ष्मी स्वरूप कही जाने वाले बेटियों का भी उसी तरह से स्वागत करते हैं जितना बेटे के जन्म पर खुशियां मनाई जाती है। इसी का परिणाम है कि जोधपुर के उम्मेद हॉस्पिटल में इन दिनों परिजन नवजात के जन्म के बाद अब उन्हें हॉस्पिटल से ही सेलिब्रेट करते हुए घर ले जा रहे हैं। इसके लिए कार से लेकर हॉस्पिटल में भी डेकोरेशन कर लोग न्यू बोर्न बेबी का स्वागत कर रहे हैं। खास बात ये है कि इस सेलिब्रेशन में चाहे बेटा हो या बेटी कोई भेद नहीं है। हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉक्टर मोहन मकवाना ने बताया कि उम्मेद हॉस्पिटल संभाग का सबसे पुराना हॉस्पिटल है। यहां सबसे अधिक डिलीवरी का वर्ल्ड रिकॉर्ड है। यहां रोजाना 75 से 80 डिलीवरी होती है। जिसमें 65 प्रतिशत के करीब नॉर्मल डिलीवरी होती है। बदलते समय के साथ लोगों की सोच भी बदलने लगी है। यहां बेटा हो या बेटी, जन्म के बाद पेरेंट्स उन्हें सेलिब्रेट करते हुए घर ले जाते हैं। इन दिनों नवजात के स्वागत का प्रचलन काफी बढ़ा है। बता दें कि जोधपुर का उम्मेद हॉस्पिटल जो प्रदेश का सबसे बड़ा जनाना हॉस्पिटल है। इसकी नींव मारवाड़ रियासत के तत्कालीन शासक महाराजा कर्नल उम्मेद सिंह ने 6 अप्रैल 1936 को रखी थी। जहां एक ही दिन में सबसे अधिक डिलीवरी का रिकॉर्ड है। यहां आज भी रोजाना 80 से 100 बच्चो की डिलीवरी की जाती है। भामाशाहों ने भी दिया सहयोग महाराजा कर्नल उम्मेद सिंह ने हॉस्पिटल की नींव रखी तो जोधपुर के भामाशाहों ने भी यादगार योगदान दिया। यह वो समय था जब महिलाओं के प्रसव और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए पूरे राजस्थान में कोई संस्थान नहीं था। इसके निर्माण में सेठ चंपालाल खीचन और मूलराज गोलेच्छा ने 27 हजार रुपए का दान दिया। तब उन्हें सोना पालकी और कैफियत का सम्मान मिला। इमारत को महल जैसा हेरिटेज लुक दिया गया। इतनी मजबूत इमारत बनाई कि आज भी यह शान से खड़ी है। 31 अक्टूबर 1938 यह इमारत बन कर तैयार हुई और इसे आम जनता को समर्पित कर दिया गया। पहले राज दरबार का था नियंत्रण आजादी से पहले यह राज-दरबार के नियंत्रण में था। बाद में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया। 1968 में डॉ. सम्पूर्णानंद आयुर्विज्ञान महाविद्यालय जोधपुर की स्थापना हुई तो अस्पताल मेडिकल कॉलेज के अधीन आ गया। शुरुआत में इसमें 166 बेड थे। वर्ष 1973 में जरूरत को देखते हुए 330 बेड कर दिए गए। वर्ष 1988 में शिशु शल्य विभाग की स्थापना के साथ बेड की संख्या 625 हो गई। वर्तमान में यहां 817 बेड की व्यवस्था है।


