राज्य में 8000 प्राथमिक स्कूलों में एक शिक्षक हैं। वहीं रांची जिले के 400 स्कूलों में भी एक-एक शिक्षक हैं। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के अनुसार, छात्रों की संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं। इसका सीधा असर यह है कि शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। क्वालिटी एजुकेशन बाधित है। क्योंकि एक शिक्षक पर कई कक्षाओं और विषयों को संभालने का दबाव हमेशा बना रहता है। इतना ही नहीं, सभी विषयों को ठीक से कवर करना मुश्किल है। शिक्षक के अवकाश पर जाने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था सिर्फ खानापूर्ति के लिए की जाती है। सर्वेक्षण टीम में प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, नरेगा वाच के जेम्स हेरेंज, पचाठी सिंह, पल्लवी कुमारी, सोमवती और सारंग गायकवाड़ शामिल थे, जिसकी सर्वे रिपोर्ट में कई तरह की खामियां सामने आई हैं। इन्होंने झारखंड के लातेहार जिले के मनिका प्रखंड की सर्वे रिपोर्ट जारी की है। इनका कहना है कि राज्य के सभी प्रखंडों में कमोबेस यही स्थिति है। मनिका प्रखंड के स्कूलों में क्या-क्या मिलीं खामियां… आरटीई नियम में यह है शिक्षक -छात्र अनुपात : आरटीई नियम 2009 के अनुसार, 60 छात्रों के लिए दो शिक्षक होना जरूरी है। वहीं 61 से 90 छात्रों के लिए तीन शिक्षक होने चाहिए। इसी प्रकार 91 से 120 छात्रों के लिए चार और 121 से 200 छात्रों के लिए पांच शिक्षक सहित एक प्रधानाध्यापक होना चाहिए। लेकिन जिन स्कूलों का सर्वे किया गया है, वे आरटीई नियम की वास्तविकता से कोसों दूर हैं। मनिका प्रखंड के 40 स्कूलों में एक शिक्षक हैं। आरटीई मानक के अनुसार, छात्रों को पढ़ाने के लिए 99 शिक्षक चाहिए। लेकिन सिर्फ 40 शिक्षक हैं। यानि 49 शिक्षक की अभी आवश्यकता है। सर्वे में सामने आया कि 87.5% शिक्षक अस्थायी (कॉन्ट्रैक्ट) आधार पर नियुक्त हैं, जिन्हें न तो स्थायी वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा। महिला शिक्षकों की संख्या मात्र 15% है, जिस कारण छात्राओं के लिए सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण का अभाव है। शिक्षकों की कमी के कारण केवल एक-तिहाई छात्र ही नियमित रूप से विद्यालय में उपस्थित रहते हैं, जो शिक्षा के प्रति घटते विश्वास को दर्शाता है। कक्षा 5 तक के अधिकांश छात्र बुनियादी साक्षरता और गणना कौशल में कमजोर हैं। शिक्षकों का ध्यान शैक्षणिक कार्यों के बजाय प्रशासनिक कार्यों (जैसे रिपोर्टिंग, चुनाव ड्यूटी समेत गैर शैक्षणिक कार्य) में अधिक रहता है। भोजन में पोषण की कमी है और रसोइयों को छह महीने से वेतन नहीं मिला है। 82.5% विद्यालयों में शौचालय अनुपयोगी हैं। बिजली, पेयजल, फर्नीचर और सुरक्षित भवनों की कमी है। कई विद्यालयों की छतें और दीवारें जर्जर हैं, जो बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। 77.5% शिक्षक 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं और डिजिटल या आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से अपरिचित हैं। 84% छात्र एससी- एसटी वर्ग से हैं, जो पहले से ही सामाजिक -आर्थिक रूप से वंचित हैं।


