पुलिस 400 वर्गगज के विवादित प्लाॅट के दो फर्जी पट्टों की डेढ़ साल में भी ढंग से जांच नहीं कर सकी। बस आईओ के साथ नतीजे बदलते रहे। प्लाॅट के खसरे विवादास्पद हैं। फिर भी ना तो सैटलमेंट विभाग से खसरे का वास्तविक नंबर पता लगाया , ना ही यह पता लगाने की जहमत उठाई कि यूआईटी ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर विवाद निस्तारित किए बिना पट्टे क्यों जारी किए? सेवर थाने में 15 मई 23 को फर्जी पट्टों को लेकर एफआईआर दर्ज हुई। जिसमें स्टेडियम नगर के प्लाॅट नं. 218 और 218ए के पट्टे फर्जीवाड़ा कर बनाए जाने का आरोप है । आरोपियों की रजिस्ट्री ग्राम अनाह के खसरा नं. 79-80 की थी, जबकि प्लाट खसरा नं. 81-82 में हैं। थाने ने एफआर काट दी। जानकारी मिलने पर एसपी मृदुल कच्छावा ने एफआर री-ओपन कर सिटी सीओ सुनिल शर्मा को जांच दी। जिन्होंने दो पक्षों की रजिस्ट्रियों, पट्टाें के आवेदन, ले-आउट और मौके पर खसरे की तस्दीक की। उन्होंने विवादित प्लाॅट खसरा संख्या 82 में मान, अपराध प्रमाणित पाया । इसके बाद जांच फिर से बदल कर सीओ उच्चैन अनिल डोरिया को दी गई। यूआईटी और पूर्व आईओ के अनुसार विवादित प्लाट खसरा नं. 81-82 में है। डोरिया ने बिना आधार खसरा नं. 79-80 मान लिया। यह दोनों खसरे स्टेडियम नगर के लेआउट में है ही नहीं। पूरे केस में यूआईटी की बेहद संदिग्ध भूमिका के बावजूद पट्टे जारी करने वाले तत्कालीन सचिव कमलराम मीणा से पूछताछ तक नहीं की गई । पट्टे बनवाने में फर्जीवाड़े की जांच के बजाए, आरोपियों की रजिस्ट्री और कब्जा जांच एफआर लगा दी । अब इस केस में हाईकोर्ट ने उन्हें तलब किया है। अधिकारियों के साथ नतीजे भी बदलते रहे
एफआईआर की पहली जांच सेवर थाने के एएसआई अनिल कुमार ने की। उन्होंने आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 का अपराध प्रमाणित माना। दूसरी जांच सेवर एसएचओ सुनील कुमार गुप्ता ने की। उन्होंने सिविल नेचर का मान एफआर काट दी। एसपी मृदुल कच्छावा ने री-ओपन कर जांच सीओ सिटी सुनील प्रसाद शर्मा को दी । उन्होंने धारा 420, 406, 447, 37 में अपराध प्रमाणित माना। एसपी ने चौथी जांच सीओ उच्चैन अनिल डोरिया को दी । उन्होंने सिविल नेचर का मान कोर्ट में एफआर पेश की । सीओ सिटी सुनील शर्मा ने इन तथ्यों पर अपराध प्रमाणित माना… यूआईटी के रिकॉर्ड के अनुसार विवादित प्लाट ग्राम अनाह के खसरा संख्या 82 में माना। विवादित प्लाट के पड़ोसियों के मकान भी स्टेडियम नगर के खसरा नं. 82 में हैं। आरोपियों की रजिस्ट्री में दर्ज खसरों पर केशव नगर कॉलोनी है, जबकि आरोपियों ने आवेदन स्टेडियम नगर के प्लाटों के पट्टे के लिए किया। पट्टे के लिए आरोपियों ने खसरा नं. 79- 80 के दस्तावेज दिए। खसरा नं. 82 का कोई रिकॉर्ड नहीं दिया। खसरा नं. 79- 80 में खसरा नं. 81- 82 का प्लाट नं. 218 शामिल बता झूठा मौका बताते हुए गलत पट्टे जारी कराए। गड़बड़ी यह भी… निगम को हस्तांतरित स्टेडियम नगर के यूआईटी ने क्यों जारी किए पट्टे पहले सत्यापन किया था, अब जांच कर रहा हूं – डोरिया “पहले मुझे फाइल केवल सत्यापन के लिए दी गई थी। मेरे पास जांच के लिए दूसरे केस भी थे। एसपी साहब की अप्रूवल से कोर्ट में एफआर पेश की गई। हाईकोर्ट ने बुलाया है। कई पहलुओं की पड़ताल होना बाकी है। जांच में समय लगेगा।”
-अनिल डोरिया, सीओ उच्चैन सीओ उच्चैन अनिल डोरिया ने आरोपियों की रजिस्ट्री असल बताया , लगाई एफआर
सीओ का तर्क था कि विवादित प्लाट ग्राम अनाह खसरा नं. 79, 80 में है , जबकि यूआईटी और पूर्व आईओ के अनुसार प्लाट खसरा नं. 82 में है। दलील दी कि प्लाट बेचने वालों ने भूखंड पर नींव और दीवार बना रखी थी। ऐसे में परिवादी ने 2019 तक तकादा नहीं किया, जबकि विवाद में 2015 में 8 राउंड फायरिंग और 2019 में मारपीट के केस हो चुके। तर्क दिया कि दी एसएचओ ने भी सिविल नेचर का मान एफआर दी थी, यदि ऐसा है तो फर्स्ट आईओ के अनुसार अपराध प्रमाणित क्यों नहीं माना? दलील दी कि आरोपियों की रजिस्ट्री असल है, लेकिन वह भूल गए कि आरोप फर्जीवाड़े से पट्टा बनाने का है? एफआईआर क्वैश की पिटिशन एसएचओ की सिविल नेचर के स की रिपोर्ट पर निस्तारित हुई थी। जिसे आरोपी री-ओपन करा रहे हैं, ऐसे में पिटिशन लंबित रहते आरोप प्रमाणित मानना उचित नहीं। पट्टे शून्य घोषित करने का दावा पेंडिंग है। जबकि सिविल केस से आपराधिक आरोप समाप्त नहीं होते। एक्सपर्ट व्यू – चौहान ने कहा लगता है विवेक के बजाय प्रभाव में हुई जांच तथ्यों से आभास होता है कि विवेक के बजाए प्रभाव में जांच हुई। कोर्ट में पेश एफआर में ये खामियां हैं-


