फसल की सलाह:गेहूं-जौ-चने का बीज 3 और मक्का-सरसों का 2 साल बाद बदल लें, एक ही किस्म बोते रहने से रोग प्रतिरोधक व अंकुरण क्षमता घटती है

खेती में बीज की किस्म और फसलें प्राय: संबंधित क्षेत्र के फसली मौसम, मिट्टी की उर्वरता, जलवायु आदि के अनुसार चयनित होती हैं। जलवायु परिवर्तन, वर्षा मॉडल बदलने, तापमान में घटत-बढ़त जैसी परिस्थितियों के चलते यदि पर्यावरण बदलता है तो पुरानी किस्म उतनी अनुकूल नहीं रहती। नई जलवायु के लिहाज से नई किस्म ज्यादा उपयोगी होती है। यानी मिट्टी, खाद और मेहनत तब ही रंग लाएगी जब बीज सही हो। यदि बीज सही चुनेंगे तो उपज में 20 से लेकर 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है। बार-बार पुराने या मिलावटी बीज बोने से उसकी आनुवंशिक शुद्धता कम होती है। इसके लिए हर 3-4 साल में बीज बदलना चाहिए और प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए। गेहूं, जौ और चना में अंकुरण क्षमता 85% से कम हो जाए तो बीज अनुपयोगी माना जाता है। इनका बीज 3 साल बाद और मक्का-सरसों का बीज 2 साल बाद बदल लेना चाहिए। बीज एक ही तरह का, तो ये 2 नुकसान अनुवांशिक : बीज कमजोर होता, दाने का रंग-आकार बदल जाता है। गेहूं की किस्म पीबीडब्ल्यू-343 में एचडी-2967 मिल जाए तो पौधा खराब हो जाता है।
गुणवत्ता : बीज की कोशिकाओं में ऑक्सीकरण व एंजाइम क्रियाओं की कमी हो जाती है। भंडारण सही न हो तो कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन और वसा कम हो जाती है। नमी व तापमान के प्रभाव से झिल्ली टूटने लगती है। इलेक्ट्रोलाइट रिसाव बढ़ता है। अंकुरण कम और धीरे होता है, पौधे छोटे-पतले निकलते हैं। किस फसल का बीज कितने समय में बदलें स्वपरागी : गेहूं, जौ, चना का बीज हर 3-4 साल बाद।
परपरागी : मक्का, सरसों, सूरजमुखी का बीज हर 2-3 साल बाद।
संकर : हाइब्रिड मक्का, कपास, धान का बीज हर साल नया लें।
सिंथेटिक : मक्का, ज्वार का बीज हर 3 साल बाद।
समिश्रित : बाजरा, ज्वार का बीज हर 2-3 साल बाद। बीज में होने वाले रोग और फसलों पर असर गेहूं – करनाल बंट रोग में दाने काले, बदबूदार हो जाते हैं। रस्टरोग में पत्तियों, तनों व बालियों पर पीले/काले धब्बे बनते हैं। स्मटरोग में दाने नहीं बनते, काली धूल जैसे बीजाणु दिखते हैं।
ये किस्में बोएं : राज 3077 किस्म समय पर या देर से बोने, हल्की से मध्यम लवणता/क्षारीय मिट्टी के लिए उपयुक्त। राज-3765 व राज 3777 किस्म ज्यादा तापमान और रोगों के प्रति सहनशील होती है। सामान्य व बहुत देर से बोने के लिए भी अच्छी। राज 4037, राज 4083, राज 4079 किस्म गर्म इलाकों के लिए अनुकूल। जौ – लूज स्मट रोग में बालियां पूरी काली हो जाती हैं। कवर्डस्मट रोग में दाने पर काली परत बन जाती है। पत्ती झुलसा रोग में पत्तियां सूखकर भूरी-धब्बेदार हो जाती हैं।
ये किस्में बोएं – आरडी 2552 खारे पानी के लिए अनुकूल। आरडी 2668 उद्योग के लिए, दो पंक्तियों वाली किस्म। राजकिरण किस्म सूत्रकर्मी (छोटे कीड़े) प्रतिरोधी है। कैसे पहचानें…बीज असली है या नकली असली बीज सीलबंद होता है। पैकेट पर कंपनी का नाम, लोगो, बैच नंबर और रजिस्टर्ड एड्रेस अंकित होना चाहिए। नकली बीज अक्सर ढीले/खुले बोरे या नकली लोगो में बेचे जाते हैं। बीज अधिनियम के अनुसार अधिसूचित किस्म या प्रजाति के बीज के थैले या पैकेट पर लेबल लगा होना जरूरी है। टैग पर फसल और किस्म का नाम, अंकुरण प्रतिशत (प्राय: 85%), शुद्धता (98%), नमी (12%), पैकिंग और वैधता तिथि लिखी होती है। टैग या सील टूटी हुई हो तो बीज पर भरोसा न करें। बीज खरीदते समय बिल जरूर लें। यदि बीज खराब निकले तो बीज निरीक्षक, उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकते हैं। धोखाधड़ी का मामला भी दर्ज करा सकते हैं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *