जालंधर | श्री हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन के दूसरे दिन की चौथी प्रस्तुति विदुशी अश्वनी भिड़े देशपांडे ने दी। श्रोताओं को जयपुर-अतरौली घराने की गायकी का रसपान मिला। उन्होंने राग मधुवंती में उक्त बंदिश सुनाई। ये उनकी अत्यंत प्रतिष्ठित रचना है। यह बंदिश राग के “विलंबित’ यानी धीमी गति के रूप में पेश की गई। जिसका श्रोताओं ने खूब आनंद लिया। उन्होंने गायन में अगले बोल पेश किए – आरी मैं जागी सारी रैनापिया की बाट जोवत…कब आवत हैं मोरे मंदिरवा “अमर’ पिया मन हर लीनो। उन्होंने राग मधुवंती में विरह (जुदाई) के दर्द को जीवंत कर दिया। उन्होंने 1.30 घंटे की प्रस्तुति दी है। उन्होंने तीन ताल में रूपक राग में भी पेशकारी दी है। उनके साथ हरमोनियम पर डॉ. विनय मिश्रा और तबले पर पंडित विनोद लेले ने संगत की है। स्थायी: आरी मैं जागी सारी रैना, तड़पत हूं कल ना परत मोहे। अंतरा: पिया बिन कछु ना सुहावे, बिरहा की मार तड़पत हूं।


