बिना विवेक के दिया दान भी कभी-कभी संकट का कारण बन जाता है: पं. त्रिभुवन

कुलिया गांव स्थित शिव मंदिर परिसर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठवें दिन व्यास पीठ से भागवताचार्य पं. त्रिभुवन महाराज ने सुदामा चरित्र का भावपूर्ण और अर्थपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि ईश्वर केवल मनुष्य के कर्म ही नहीं, बल्कि यह भी देखता है कि वह क्या खा रहा है, क्या दे रहा है और किस भाव से जीवन जी रहा है। इन्हीं कर्मों और आचरण के क्रम के अनुसार मनुष्य को जीवन में फल प्राप्त होता है। पं. त्रिभुवन महाराज ने सुदामा चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि सुदामा अत्यंत निर्धन होने के बावजूद मन से शुद्ध और आचरण से संयमी थे। उन्होंने बताया कि सुदामा द्वारा खाया गया चना सामान्य प्रतीत होता है, लेकिन वह श्रापित था और उसके सेवन का प्रतिफल सुदामा को अपने जीवन में भुगतना पड़ा। यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि भोजन पेट भरने का साधन नहीं है, उसका संबंध हमारे कर्म और भाग्य से भी जुड़ा होता है। इसलिए मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह क्या खा रहा है और किस भाव से ग्रहण कर रहा है। दान, भोग और संग्रह तीनों में संतुलन आवश्यक है। बिना विवेक के दिया गया दान भी कभी-कभी संकट का कारण बन सकता है। इसलिए गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी दोनों का कर्तव्य है कि वे मिलकर निर्णय लें और परिवार तथा समाज के हित में कार्य करें। संपत्ति को सहेजने व संतुलन का दायित्व पत्नी का: कथा के दौरान गृहस्थ जीवन पर भी महत्वपूर्ण संदेश देते हुए पं. त्रिभुवन महाराज ने कहा कि परिवार की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में पत्नी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि घर की महिलाएं इस बात पर ध्यान रखें कि पति कहां, क्या और किसे दे रहा है। घर के लिए आवश्यक संपत्ति को सहेजने और संतुलन बनाए रखने का दायित्व पत्नी का होता है। यह संदेश गृहस्थ धर्म में संतुलन, समझदारी और जिम्मेदारी का प्रतीक है।

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