लुधियाना| भगवान महावीर अहिंसा और अपरिग्रह की साक्षात मूर्ति थे। वह सभी के साथ समान भाव रखते थे और किसी को भी कोई दुःख नहीं देना चाहते थे। पंचशील सिद्धान्त के प्रवर्तक एवं जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी मूर्तिमान प्रतीक थे। जिस युग में हिंसा, पशुबलि, जात-पात के भेदभाव का बोलबाला था. उसी युग में भगवान महावीर ने जन्म लिया। भगवान ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। ड्यूक फैशंस इंडिया के चेयरमैन कोमल कुमार जैन ने बताया कि त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था। भगवान महावीर ने चर्तुविद संघ की स्थापना की। देश के भिन्न भिन्न भागों में घूमकर भगवान महावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया उन्होंने दुनिया को पंचशील के सिद्धान्त बताए। चक्रवर्ती के अनुसार, ये शिक्षाएं व्यक्ति के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद करती हैं। महावीर की शिक्षाओं को उनके प्रमुख शिष्य, इंद्रभूति गौतम ने जैन आगम के रूप में संकलित किया था। पूरे विश्व में अहिंसा और सत्य का सन्देश देने वाले ऐसे भगवान महावीर को हमारा शत शत नमन। महावीर स्वामी की जय हो।


