पंकज सिन्हा | मुरलीपहाड़ी जामताड़ा जिला के नारायणपुर प्रखंड के भेलाटांड़ गांव में 25 से 30 किसान 100 सालों से भी अधिक समय से ईख की खेती करते आ रहे हैं। यह खेती इनकी पुस्तैनी है। इनके पूर्वज लंबे समय से ईख की खेती करते आ रहे हैं। गांव के खेतों में पीली मिट्टी और रेतीली मिट्टी होने के कारण ईख की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। इस वर्ष भी इस गांव के 20 हेक्टेयर भूमि पर ईख की फसल लगाई गई थी। जिसकी बिक्री इस समय की जा रही है। मुनाफे की अगर बात करें तो प्रत्येक किसान को ईख की फसल लगाने और कीटनाशक के प्रयोग में 1.55 लाख रुपए प्रति वर्ष खर्च होते हैं, वहीं जब ईख की कटाई कर बेची जाती है तो उन्हें करीबन 2 लाख रुपए प्रति वर्ष प्रत्येक किसान को मुनाफा होता है। जिससे इनकी जिंदगी बड़े ही आराम से कट रही है। बताते चलें कि भेलाटांड़ गांव के किसान काफी मेहनती और लगनशील है। ईख की खेती करना इनकी जीविका का प्रमुख साधन है। यहां के किसान आसपास के किसानों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं। किसान हेमंत सेन एवं निवास चन्द्र दास ने बताया कि गांव के लोग काफी समय से ईख की ही खेती करते है। यह खेती इनकी पुस्तैनी है। सालों से इनका परिवार ईख के कारोबार से जुड़ा हुआ है। पहले इनके दादा जी ईख की खेती किया करते थे ,फिर पिता जी ने किया और अब यह पुस्तैनी धंधा खुद इनके कंधे पर है। इस गांव के अन्य किसान भी ईख के कारोबार में इनकी प्रेरणा पाकर जुड़ने लगे है। किसान ..संतोष दास, परीक्षित सेन, साधन सेन, जगन्नाथ सेन, कौशल पंडित, राजेश पंडित, मुकेश पंडित, अजीत दास, आताश दास, उचित सेन और गौर सेन सहित अन्य किसान प्रेरणा पाकर ईख की खेती करते हैं। यहां के ईख की क्वालिटी बेहतर: यहां उगाई जाने वाली ईख की काली और सफेद प्रजातियों की होती है जो काफी स्वादिष्ट और मिठास से भरी होती हैं। इसी वजह से इसकी मांग झारखंड की राजधानी रांची समेत बिहार, बंगाल तक है। छठ पर्व, शादी ब्याह या सत्यनारायण पूजा जैसे मौकों पर जब कहीं ईख नहीं मिलता, तब भी इस गांव में ईख बड़ी आसानी से मिल जाती है। जामताड़ा शहर और अन्य बाजारो में जो गन्ने का रस गर्मियों में में बिक रहा है, उसका बड़ा हिस्सा इसी गांव से आता है। किसानों के द्वारा बताया गया है कि जामताड़ा शहर में इनकी तीन मशीनें गन्ना जूस की लगी है। जूस बेचने का कारोबार भी इनके द्वारा किया जा रहा है। ग्रोथ बढ़ाने के लिए कीटनाशक दवाओं का करते हैं प्रयोग ईख की ग्रोथ बढ़ाने के लिए यहां के किसान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, एजोस्पिरिलम, फॉस्फोबैक्टीरिया और जैविक खादों का इस्तेमाल करते हैं। इससे फुटाव अच्छा होता है और फसल की गुणवत्ता भी बढ़ती है। क्षेत्र के 150 मजदूरों को मिल रहा है रोजगार ईख की खेती से क्षेत्र के 150 मजदूरों को रोजाना ईख की देखभाल और और कटाई कार्य से रोजगार मिल रहा है। प्रति मजदूर 300 रुपए दिए जाते हैं। ईख की खेती में लगे सैकड़ों मजदूरों को कहीं भी बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


