राज्य के इकलौते सुपर स्पेशलिटी अस्पताल डीकेएस में डायलिसिस की 55 में 43 मशीनें कबाड़ जैसी हालत में रखी हैं। पिछले एक साल के दौरान एक के बाद एक मशीनें बंद होती गईं और उन्हें जिस कमरे में चल रही थीं उसके किनारे एक दूसरे से सटाकर रख दिया। उसके बाद से अस्पताल प्रशासन मशीनें सुधारने के टेंडर में ही उलझा हुआ है। दो बार टेंडर जरूर निकाले गए लेकिन पहले को रद्द कर दिया और दूसरे में 4 बार संशोधन किया गया। इस वजह से अब तक मशीनें नहीं सुधारी गईं। नतीजा पहले जहां रोज 70 से 80 मरीजों की डायलिसिस होती थी, वहीं अब केवल 20-25 मरीजों की जा रही है।
फ्री और कम पैसे में डायलिसिस कराने वाले मरीजों को अब प्राइवेट अस्पतालों में पैसे देने पड़ रहे हैं। निजी अस्पतालों में आयुष्मान से फ्री डायलिसिस की सुविधा है, लेकिन वहां टाइमिंग लेकर लोगों को दिक्कत हो रही है। एक मरीज की डायलिसिस में न्यूनतम 4 घंटे लगते हैं। ऐसे में कई अस्पतालों को अपनी सहूलियत के अनुसार समय नहीं मिल पा रहा है। मरीजों को इतनी परेशानी के बावजूद अस्पताल प्रशासन अब तक टेंडर प्रक्रिया में ही उलझा हुआ है। जनवरी में निकाला टेंडर, मार्च में किया निरस्त
मशीनों में तकनीकी खामी शुरू होने के बाद जनवरी में इनके मेंटेनेंस का पहली बार टेंडर निकाला गया। दो माह के भीतर मार्च में प्रक्रिया पूरी करने के पहले ही उसे निरस्त कर दिया गया। उसके बाद 7 माह बाद नवंबर में दूसरी बार टेंडर जारी किया गया। लेकिन इसकी प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं की गई। इस टेंडर में चार बार नियमों को बदलाव किया जा चुका है। नवंबर में टेंडर निकाला गया तो पुरानी मशीनों को मरम्मत करने के लिए एजेंसियों को आमंत्रित किया गया। फिर उसमें संशोधन कर 40 नई मशीनें लगाने का टेंडर जारी किया गया। कुछ दिनों बाद उसमें फिर संशोधन कर पुरानी 55 मशीनों की मरम्मत कर उसके मेंटेनेंस का टेंडर किया गया। टेंडर की तारीख भी बढ़ा दी गई। लेकिन अब तक एक भी कंपनी डीकेएस की डायलिसिस मशीनों को चलाने के लिए नहीं आई है। एक साल में दो टेंडर, पिछले एक माह में 5 संशोधन टेंडर की जानकारी ली जाएगी ^ डीकेएस में डायलिसिस मशीनों की टेंडर प्रक्रिया में बार-बार संशोधन के बारे में अस्पताल के जिम्मेदारों से जानकारी ली जाएगी। इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। मशीनें जल्दी चालू करवाना हमारी प्राथमिकता है।
डा. यूएस पैकरा, चिकित्सा शिक्षा संचालक रात तक मरीज करते हैं इंतजार : डीकेएस अस्पताल में डायलिसिस की 55 मशीनें हैं। लेकिन पिछले करीब एक साल में सभी मशीनें एक-एक कर खराब हो चुकी हैं। अभी यहां केवल 12 मशीनों से मरीजों की डायलिसिस हो रही है। जिन मरीजों के पास पैसे नहीं हैं, वे मजबूरी में देर रात तक अपनी बारी आने का इंतजार करते हैं। कई बार दूरदराज के गांव से आने वालों को रात का समय दिया जाता है। मरीज शाम को ही पहुंच जाते हैं और आधी रात तक अपनी बारी का इंतजार करते हैं। उसके बाद उनका डायलिसिस होता है। हफ्ते की दो हो या तीन, मरीजों को इस तरह की पीड़ा झेलनी पड़ रही है।


