अलवर| मन्नी का बड़ स्थित दिगंबर जैन आदिनाथ मंदिर में बुधवार को भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के प्रकटोत्सव पर पहली बार समोशरण जिनवाणी रथयात्रा निकाली गई। सुबह 10 बजे रथयात्रा मन्नी का बड़ स्थित आदिनाथ जैन मंदिर से शुरू हुई। रथयात्रा में बैंड, घोड़े, लवाजमा, ताशी पार्टी, स्कूल के बच्चे, हाथों में ध्वज लिए महिलाएं, भजन मंडली, भजनों पर डांडिया करते जैन समाज के लोग, राजा श्रेयांश द्वारा भगवान आदिनाथ को प्रथम आहार देते हुए की झांकी, विद्यासागर महाराज की समाधी दिवस की झांकी, ऐरावत की झांकी, जैन श्रद्धालु जैन धर्म के गुरुओं का कटआउट लेकर चल रहे थे। रथयात्रा में दिगंबर जैन साध्वी आर्यिका 105 आर्षमति माता जी भी ससंघ शामिल हुई। रथयात्रा में सबसे आखिर में समोशरण में जिनवाणी का रथ। रथयात्रा का मुख्य आकर्षण भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का जमीन से प्रकोटत्सव की झांकी और हेलीकॉप्टर नुमा ड्रोन से पुष्पवर्षा थी। रथयात्रा के वीर चौक पहुंचने पर वीर चौक जैन व्यवसायी संघ की ओर से जैन साध्वियों का पाद प्रक्षालन किया गया। रथयात्रा वापस मन्नी का बड़ पहुंचकर संपन्न हुई। रथयात्रा का मार्ग में कई जगह स्वागत किया गया। होपसर्कस पर शहनाई वादन किया गया। इससे पूर्व सुबह मंदिर में 1008 भक्तामर महादीप अराधाना, मूलनायक भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का अभिषेक, शांतिधारा, झंडारोहण हुआ। इस दौरान मंदिर कमेटी के अध्यक्ष प्रदीप जैन, सचिव, राकेश जैन, उपाध्यक्ष नरेश जैन बड़तलिया, कोषाध्यक्ष प्रदीप जैन आदि मौजूद रहे। समोशरण जिनवाणी रथयात्रा में डांडिया करती महिलाएं। अलवर. समोशरण जिनवाणी रथयात्रा में जैन धर्म के धर्मगुरुओं का कटआउट लिए शामिल जैन समाज के लोग। मकान की नींव खुदाई के दौरान निकली भगवान आदिनाथ की प्रतिमा की झांकी। मंदिर के उपाध्यक्ष नरेश जैन बड़तला ने बताया कि 1948 में मन्नी बड़ पर देवकरण मीणा तांगे वाले के मकान की नींव खुदाई के समय जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की प्रतिमा निकली थी। यह प्रतिमा 29 इंच ऊंची है। यह काले पत्थर की बनी हुई है। मंदिर निर्माण से पूर्व प्रतिमा को एक टीनशेड के नीचे विराजित किया। जैन श्रद्धालुओं ने भगवान आदिनाथ की अर्चना शुरू की। जहां भगवान आदिनाथ की पद्मासन में प्रतिमा निकली उसी मंदिर का निर्माण हुआ। जिनवाणी जैन धर्म के तीर्थंकरों के उपदेश हैं। जिनवाणी को मुख्य रूप से चार विधाओं में बांटी गई है। प्रथमानुयोग (कथा/पुराण): महापुराण, आदिपुराण, पद्मपुराण। करणानुयोग (कर्म सिद्धांत/लोक): षटखण्डागम (सबसे प्रमुख), कषायपाहुड़। चरणानुयोग (आचार-विचार): रत्नकरण्ड श्रावकाचार, मूलचार। द्रव्यानुयोग (तत्त्वज्ञान): समयसार, प्रवचनसार। :जिनवाणी की विशेषताएं: सत्य ज्ञान: यह अज्ञान और राग-द्वेष से रहित (वीतराग) होकर कही गई वाणी है। ज्ञान परंपरा: श्रुत पंचमी को जैन इतिहास में ज्ञान को लिपिबद्ध करने की परंपरा का पावन दिन माना जाता है। मोक्ष मार्ग: इसे जीव और कर्म को अलग करने वाली पैनी छेनी कहा गया है। संरक्षण और सम्मान: शास्त्रों को अत्यंत आदर के साथ पढ़ा जाता है। समोशरण: समोशरण जैन धर्म में तीर्थंकर के केवलज्ञान प्राप्ति के बाद देवों द्वारा बनाई गई एक दिव्य, भव्य सभा या उपदेश मंडप है। इसका अर्थ है सभी के लिए शरण या समान अवसर, जहां मनुष्य, देवता और पशु-पक्षी सभी बिना किसी भेदभाव के समान रूप से बैठकर भगवान के दिव्य उपदेश सुनते हैं।


