भास्कर न्यूज | कोंडागांव जिले की एक संकरी गली में दोपहर की धूप तप रही है, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा गर्म है यहां की रसोई घरों में गैस की जगह चूल्हों से उठता धुआं बता रहा है कि महंगाई की आंच ने यहां की रसोई को फिर से अतीत में लौटा दिया है। गांधी वार्ड में रहने वाली सरोजी बाई ने कहा अब गैस से नहीं, लकड़ी के चूल्हे से रसोई संभालती हैं। उनका कहना है,पिछले महीने 1150 रुपए में सिलेंडर आया, अब फिर 50 रुपए बढ़ गया। कहां से लाएं इतने पैसे? बच्चों की पढ़ाई भी देखनी है, दवा भी लेनी है, अब गैस के लिए कुछ बचता ही नहीं। वो बताती हैं कि उज्ज्वला योजना कोंडागांव। जंगल से लकड़ी लेकर आती महिलाएं। गांव-शहर सभी जगह एक जैसे हालात हो गए कोंडागांव के नजदीकी गांव उसरी की रहने वाली मीना मंडावी कहती हैं, पहले सोचा था कि गैस से खाना बनेगा, तो समय बचेगा, धुआं नहीं होगा। लेकिन अब गैस भरवाने के लिए पैसे ही नहीं हैं, लकड़ी के लिए जंगल जाना पड़ता है। मीना ने कहा पति दिहाड़ी पर मजदूरी करता है। गर्मी में जंगल की आग और लकड़ी ढोना उनके लिए खतरे से खाली नहीं। छोटे शहरों में भी बड़ी तकलीफ उठा रहे हैं कोंडागांव जैसे छोटे जिलों में उज्ज्वला योजना की पहुंच तो बनी, लेकिन उसका असर अब धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है। बढ़ते दामों ने न सिर्फ गरीब तबके बल्कि निम्न-मध्यम वर्ग की महिलाओं को भी झकझोर दिया है। रेखा जो शहर में एक छोटी किराना दुकान चलाती हैं, बताती हैं, एक वक्त था जब महीने में दो बार सिलेंडर बदलते थे। अब तो तीन महीने खींचते हैं। महिलाएं गैस के दामों में मांग रही हैं राहत कोंडागांव की दर्जनों महिलाओं की मांग है कि उज्ज्वला लाभार्थियों को नियमित सब्सिडी दी जाए। गैस की कीमतों को नियंत्रित किया जाए। गरीब और निम्न आय वर्ग के लिए रसोई गैस एक मूलभूत ज़रूरत के तौर पर देखी जाए। रसोइयों में सिर्फ खाना नहीं बनता, वहां हर दिन हौसले पकते हैं, लेकिन जब चूल्हे फिर से धुआं देने लगते हैं, तो वह हौसले भी धुंधले होने लगते हैं। कोंडागांव| लकड़ी से चूल्हा जलाकर खाना बनाती हुई युवती। बिना सब्सिडी अब गैस हमारे लिए बेकार : सुलोचना ने कहा गैस मिली थी तो लगा जिंदगी आसान होगी। अब तो और मुश्किल हो गई। महीने का राशन आता है, पर गैस नहीं भरवा सकते। अगर सरकार ने गैस दी है तो कम से कम सब्सिडी तो दे, नहीं तो गैस अब हमारे लिए बेकार है।


