राजगढ़ के माचलपुर से करीब 4 किलोमीटर दूर रामगंज (नयापुरा) गांव में दो किसान भाइयों ने खेती को लेकर ऐसा नवाचार किया है, जो पूरे क्षेत्र के लिए मिसाल बन गया है। किसान रतन सिंह परमार और उनके छोटे भाई सरपंच यशवंत सिंह परमार ने परंपरागत खेती को छोड़कर उद्यानिकी और जैविक खेती को अपनाया है। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले सालाना 5-6 लाख रुपए की शुद्ध आय होती थी। यह बढ़कर अब करीब 50 लाख रुपए तक पहुंच गई है। करीब 4 साल पहले प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल न होने और परंपरागत फसलों में लगातार नुकसान होने पर दोनों भाइयों ने खेती का तरीका बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक पर निर्भरता घटाकर प्राकृतिक और जैविक खेती अपनाई। संयुक्त परिवार के रूप में उन्होंने अपनी 70 बीघा जमीन में से साढ़े 8 बीघा में अमरूद, 16 बीघा में संतरे और 18 बीघा में नई संतरे की पौध रोपाई की थी। ताईवान और इलाहाबादी किस्म उगाई
अमरूद की खेती में ताइवान पिंक और इलाहाबादी सफेद एल-49 किस्म उगाई जा रही है। ताइवान पिंक की खासियत ये कि पौधों से बार-बार फल आता है और पैदावार दोगुनी हो जाती है। वर्तमान में 1850 पौधों से प्रतिदिन लगभग 5 क्विंटल अमरूद इंदौर की मंडियों में सप्लाई किया जा रहा है। इलाहाबादी सफेद एल-49 की मिठास और आकार के कारण बाजार में इसकी कीमत 50 रुपए प्रति किलो है। 18 बीघा में संतरे के 1700 पौधे लगाए
संतरे के 17 साल पुराने बागान से दोनों भाई हर तीसरे साल में 40-45 लाख रुपए की अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने 18 बीघा में 1700 नए पौधे भी लगाए हैं, जो आने वाले चार सालों में बागान का रूप लेंगे। वहीं, प्याज, लहसुन, अदरक और हल्दी की खेती करने की भी योजना है। रतन सिंह अपने खेत पर प्याज का बीज तैयार कर रहे हैं और इसे अपने नाम से ब्रांड के रूप में बाजार में उतार चुके हैं। प्राकृतिक पद्धति से सालाना डेढ़ लाख बचा रहे
दोनों भाइयों ने रासायनिक उर्वरक कम करने और प्राकृतिक खाद, जीवामृत, केंचुआ खाद व नीमास्त्र का प्रयोग कर लागत में सालाना डेढ़ लाख रुपए की बचत की है। सरपंच यशवंत सिंह ने अपनी उर्वरक और बीज की दुकान बंद कर ये संदेश दिया कि खुद उदाहरण पेश करना ही दूसरों को प्रेरित करने का सबसे प्रभावी तरीका है। अब आसपास के गांवों से किसान उनके खेतों पर आकर जैविक खेती सीख रहे हैं। समस्या भी, फसल रौंद रही नीलगाय
किसान भाईयों का कहना है कि खेती में चुनौतियां कम नहीं हैं। नीलगायों के झुंड खेतों में नुकसान पहुंचा रहे हैं और उपज के परिवहन में भी समस्या है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत खेत सड़क योजना पर अस्थाई रोक के कारण किसानों को उपज मंडियों तक ले जाने में परेशानी हो रही है। बारिश के समय ये समस्या और बढ़ जाती है। रतन सिंह और यशवंत सिंह ने प्रशासन से खेत सड़क योजना को बहाल करने की मांग की है। रतनसिंह ने शिक्षक की नौकरी छोड़ी, बेटा वायु सेना में
रतन सिंह की व्यक्तिगत कहानी भी प्रेरक है। साल 1992 में सरकारी शिक्षक के रूप में चयनित होने के बावजूद उन्होंने नौकरी ज्वाइन नहीं की और खेती को ही जीवन का लक्ष्य बनाया। उनके बड़े बेटे राहुल सिंह परमार हैदराबाद में वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट हैं, दूसरे बेटे की बीडीएस पढ़ाई चल रही है और बेटी मध्यप्रदेश पुलिस में प्रशिक्षण ले रही है। यशवंत सिंह के बच्चे भी उच्च शिक्षा में हैं।


