मप्र को बासमती चावल पर जीआई टैग न मिलने का मुद्दा गुरुवार को राज्यसभा में दिग्विजय सिंह ने उठाया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में हर साल 4 लाख टन बासमती चावल का उत्पादन होता है, जो गुणवत्ता में अन्य राज्यों से बेहतर है। बावजूद इसके जीआई टैग न होने से यह चावल पंजाब जा रहा है, जहां व्यापारी अपना टैग लगाकर मुनाफा कमा रहे हैं। सिंह ने आरोप लगाया कि मप्र के किसानों को सोची-समझी साजिश के तहत हक से वंचित किया जा रहा है और इसमें राज्य सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। उन्होंने बताया कि मप्र को 2013 में जीआई टैग मिला था, जिसे 2016 में निरस्त कर दिया गया। यह है मप्र के बासमती का जीआई टैग का मामला मप्र में बासमती चावल के जीआई टैग को लेकर विवाद कृषि और खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के बीच 16 सालों से चल रहा है। एपीडा का तर्क है कि बासमती एक विशेष भौगोलिक पहचान है, जो केवल हिमालय के तलहटी वाले भारत-गंगा के मैदानी इलाकों में पैदा होता है। वर्तमान में बासमती का जीआई टैग 7 राज्यों पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्से के पास है। मप्र के सीहोर, नर्मदापुरम, विदिशा, रायसेन, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, श्योपुर, दतिया, शिवपुरी, गुना, जबलपुर और नरसिंहपुर जिले में बासमती चावल होता है । मप्र की जीआई टैग को लेकर लड़ाई – 2008 में एपीडा में बासमती चावल के लिए जीआई टैग के लिए आवेदन किया। 2010 में मप्र ने इसमें शामिल होने की मांग की। 2016 में बासमती को जीआई टैग मिला, लेकिन मप्र को इससे बाहर रखा गया। 2020-21 में मद्रास उच्च न्यायालय ने मप्र की याचिका खारिज कर दी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया और फिर से विचार के लिए हाईकोर्ट के लिए भेजा।


