आर्थिक दोहन की शिकायतों पर भी लगेगी लगाम रांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी, डी.लिट और डी.एससी कर रहे सैकड़ों शोधार्थियों के लिए राहत देने वाली खबर है। वर्षों से जिस समस्या को लेकर शोधार्थी सबसे अधिक परेशान रहे वह था इंटरव्यू (वाइवा) के बाद डिग्री मिलने में होने वाला लंबा और अनिश्चित विलंब। कई बार वाइवा पास करने के बावजूद शोधार्थियों को महीनों डिग्री के लिए इंतजार करना पड़ता था। इससे उनका करियर, नौकरी, प्रमोशन और अकादमिक भविष्य अधर में लटक जाता था। अब आरयू प्रशासन ने इस जटिल प्रक्रिया में बड़ा प्रशासनिक सुधार करते हुए सिस्टम ही बदल दिया है, जिससे अधिकतम पांच से सात दिन में डिग्री मिल जाएगी। क्योंकि विश्वविद्यालय ने थीसिस को यूजीसी के शोधगंगा पोर्टल पर अपलोड करने और रिजल्ट प्रकाशन से जुड़ी प्रक्रिया को सरल, तेज और पारदर्शी बनाने के लिए नियमों में आंशिक संशोधन किया है। इससे न सिर्फ डिग्री अवार्ड में तेजी आएगी, बल्कि फाइल मूवमेंट के नाम पर होने वाली देरी और कथित आर्थिक दोहन की शिकायतों पर भी प्रभावी रोक लगेगी। इस बदलाव को लेकर आरयू प्रशासन द्वारा गुरुवार को नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। बताते चलें कि इस बदलाव के लिए सोशल साइंस डीन डॉ. परवेज हसन की आेर से प्रस्ताव आया था, जिस पर वीसी प्रो. डीके सिंह ने सहमति प्रदान कर दी।
फाइल मूवमेंट के नाम पर सवाल उठते रहे थे। विवि प्रशासन को लंबे समय से यह शिकायत मिल रही थी कि यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर सेंटर तक थीसिस भेजने की प्रक्रिया में शोधार्थियों से अनौपचारिक खर्च की मांग की जाती है। फाइल जान बूझकर रोके जाने के आरोप लगते रहे हैं। इसमें डिग्री देने में देरी होती है। नई व्यवस्था से यह पूरा चेन छोटा हो जाएगा, जिससे आर्थिक शोषण की संभावनाएं भी काफी हद तक खत्म हो जाएंगी। अब डीन को मिला सीधे अधिकार
शोधगंगा पर थीसिस अपलोड करने का अधिकार अब सीधे फैकल्टी यानि संबंधित स्ट्रीम के डीन कार्यालय को दिया गया है। वे अब पीएचडी/ डी.लिट/ डी.एससी की अनुशंसित थीसिस को वाइवा परीक्षा के सफल समापन के बाद सीधे शोधगंगा पर अपलोड करने के लिए विवि मुख्यालय की जगह कंप्यूटर सेंटर को भेज सकेंगे। अपलोड होते ही विवि के परीक्षा विभाग को रिपोर्ट भेज दी जाएगी और अधिकतम पांच से सात दिनों में डिग्री अवार्ड हो जाएगी।
अब तक क्या था नियम
विवि मुख्यालय से मोरहाबादी स्थित कंप्यूटर सेंटर तक थिसिस की शॉफ्ट कॉपी भेजने में प्रक्रिया उलझी रहती थी। अभी तक की व्यवस्था में अनुशंसित थीसिस की सॉफ्ट कॉपी पहले यूनिवर्सिटी मुख्यालय भेजी जाती थी। इसके बाद फाइल को कंप्यूटर सेंटर भेजा जाता था, जहां से थीसिस को शोधगंगा पोर्टल पर अपलोड किया जाता था। फाइल कई स्तरों से गुजरती थी, जिसमें विभाग, संकाय और प्रशासनिक शाखाओं के बीच तालमेल में कमी रहती थी। जिससे अपलोड करने में अनावश्यक देरी होती थी।
पुरानी समस्या पर अब लगेगा ब्रेक : अब तक की व्यवस्था में पीएचडी इंटरव्यू पास करना अंत नहीं, बल्कि कई बार एक नए इंतजार की शुरुआत साबित होती थी। यूजीसी के पोर्टल शोधगंगा पर थीसिस अपलोड से लेकर डिग्री अवार्ड होने तक की प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि फाइलें महीनों दफ्तरों में घूमती रहती थीं। रिसर्च स्कॉलर यूनिवर्सिटी मुख्यालय के चक्कर काटने को मजबूर होते थे और डिग्री मिलने की कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं थी।
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