विदिशा और रायसेन को जोड़ने वाला लगभग 200 साल पुराना ऐतिहासिक ‘दो कौड़ी’ पुल शहर की विरासत का प्रतीक बना हुआ है। अब इस धरोहर के संरक्षण के लिए समाजसेवी, विरासत प्रेमी और प्रशासनिक अधिकारी एकजुट होकर आगे आ रहे हैं। इतिहासकार गोविंद देवलिया के अनुसार, इस पुल का निर्माण ग्वालियर साम्राज्य के समय हुआ था। उस दौरान विदिशा के जमींदार श्रीवास्तव परिवार से थे। एक बार सिंधिया महाराज के बुलावे पर जमींदार समय पर नहीं पहुंच सके, जिस पर महाराज ने उन पर ‘दो कौड़ी’ का जुर्माना लगाया। जमींदार ने जुर्माना भरने के बजाय जनहित का कार्य करने का निवेदन किया। तब महाराज ने बेतवा नदी पर विदिशा और रायसेन को जोड़ने वाले पुल के निर्माण का सुझाव दिया। इसी जुर्माने के बदले जमींदार द्वारा यह पुल बनवाया गया, जो बाद में ‘दो कौड़ी का पुल’ कहलाया। 180 साल तक आवाजाही का प्रमुख जरिया रहा
विदिशा के तत्कालीन जागीरदार गौरी शंकर श्रीवास्तव ने इस पुल का निर्माण कराया था। यह पुल लगभग 180 वर्षों तक क्षेत्र में आवागमन का प्रमुख साधन रहा। समय के साथ यातायात बढ़ने पर पुल संकरा पड़ने लगा। इसके बाद इसके समीप एक नया पुल बनाया गया, जिसके कारण पुराने पुल से आवागमन बंद हो गया। इंटेक विदिशा के संयोजक और विरासत समूह के सचिव अरविंद श्रीवास्तव ने बताया कि यह पुल विदिशा के लिए केवल एक संरचना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है। लंबे समय तक उपेक्षा के कारण पुल पर झाड़ियां और गंदगी जमा हो गई थी। इसे हटाने के लिए समाजसेवियों, विरासत प्रेमियों और स्थानीय लोगों ने श्रमदान किया और पुल की सफाई तथा साज-सज्जा का कार्य किया। उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में इस ऐतिहासिक पुल का सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से उपयोग करने की योजना है। इसका उद्देश्य यह है कि बाहर से आने वाले लोग इसकी ऐतिहासिक महत्ता को समझ सकें और विदिशा की धरोहर से जुड़ सकें। ‘दो कौड़ी’ का पुल आज भी अतीत की कहानियों को समेटे हुए है, और शहरवासी इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजने में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं।


