भास्कर न्यूज | बारगांव बारगांव ग्राम में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है। जिसके छठे दिन मंगलवार को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। कथावाचक पंडित खिलेंद्र दुबे ने संगीतमय कथा वाचन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की लीलाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि श्रोता भावविभोर हो उठे और पूरा कथा पंडाल भक्ति रस से सराबोर हो गया। पंडित दुबे ने कहा कि लीला और क्रिया में गहरा अंतर होता है। उन्होंने समझाया कि अभिमान, स्वार्थ या स्वयं सुखी रहने की इच्छा क्रिया कहलाती है, जबकि दूसरों को सुखी रखने और समाज के कल्याण की भावना लीला होती है। भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला लोक कल्याण के उद्देश्य से प्रेरित थी। गोकुल में माखन चोरी की लीला का भावार्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका तात्पर्य केवल माखन चुराना नहीं, बल्कि भक्तों के मन की चोरी करना है। भगवान अपने प्रेम, करुणा और सरलता से भक्तों के हृदय को जीत लेते हैं। पूतना वध का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना ने माता का रूप धारण कर बालकृष्ण को विषैला दूध पिलाने का प्रयास किया, परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर अधर्म का नाश किया। यह लीला यह संदेश देती है कि भगवान सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और अधर्म का अंत सुनिश्चित करते हैं। अपने जीवन से अहंकार का त्याग करना जरूरी: कथावाचक ने कहा कि जब तक मनुष्य अपने जीवन से अहंकार का त्याग नहीं करता, तब तक अज्ञान और अंधकार दूर नहीं होता। कथा के दौरान पंडाल को भव्य सजावट से सजाया गया था। श्रद्धालुओं ने गोवर्धन महाराज की प्रतिमा के समक्ष नृत्य किया। भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगाए। गोवर्धन पर्वत प्रसंग, इंद्र का अहंकार टूट गया गोवर्धन लीला का वर्णन करते हुए पंडित दुबे ने कहा कि जब ब्रजवासी इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए पूजा की तैयारी कर रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत, प्रकृति और कर्म की पूजा करने का संदेश दिया। इससे क्रोधित होकर इंद्रदेव ने मूसलाधार वर्षा कर दी। जिससे समस्त ब्रजवासी भयभीत हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गोकुल, मथुरा और वृंदावन के लोगों को उसके नीचे सुरक्षित स्थान दिया। इस लीला से इंद्रदेव का अहंकार चकनाचूर हो गया


