भास्कर न्यूज | जालंधर हिंदू धर्म का प्रमुख व्रत-पर्व संकष्टी चतुर्थी इस वर्ष 5 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। फाल्गुन माह में पड़ने वाली इस चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य का दर्जा प्राप्त है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत व विधिपूर्वक पूजन करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से सुहागिनें अपनी संतान की कुशलता और पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से पारिवारिक सुख-शांति बनी रहती है और जीवन में सकारात्मकता आती है। श्री शिव दुर्गा खाटू श्याम मंदिर कमल विहार के पं. गौतम भार्गव ने बताया कि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और बल के देवता हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा की जाती है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से संकटों से मुक्ति, ज्ञान प्राप्ति और ऐश्वर्य बढ़ाने के लिए किया जाता है। मान्यता है कि गणेश जी अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं, इसी कारण उन्हें विघ्नहर्ता और संकटमोचन कहा जाता है। ग्रह दोषों पर पड़ता है सकारात्मक प्रभाव धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश पूजन से कुंडली में मौजूद बुध, राहु और केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। गणेश जी को ज्ञान का देवता माना गया है, इसलिए इस दिन पूजा-व्रत करने से संतान की शिक्षा में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। साथ ही स्वास्थ्य बेहतर रहता है और घर में समृद्धि बढ़ती है। संकल्प से शुरुआत, अर्घ्य से होगा व्रत का समापन .प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। .पूजा स्थल गंगाजल से शुद्ध करें। .शुभ मुहूर्त में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। .पूजा के समय माता दुर्गा की प्रतिमा रखना शुभ होता है। .धूप, दीप, कपूर, अक्षत अर्पित करें। .लड्डू व मोदक का भोग लगाएं। .रात्रि में चंद्रमा को जल का अर्घ्य देकर व्रत संपन्न करें।


