पॉलिटिकल रिपोर्टर|रांची गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ दिए गए बयान की झारखंड के सत्ताधारी दलों ने कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस और झामुमो ने कहा है कि दुबे का यह बयान भड़काऊ और असंवैधानिक है, जो चिंता का विषय है। कांग्रेस ने निशिकांत दुबे को बड़बोला बताते हुए उनपर कार्रवाई की मांग की है। वहीं, राजद ने इस बयान को संविधान पर हमला बताया है। मालूम हो कि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में राष्ट्रपति को नसीहत देते हुए कहा था कि तीन महीने से ज्यादा किसी बिल को नहीं रोकना चाहिए। उसी नसीहत को लेकर दुबे ने निशाना साधा था। वहीं, झामुमो केंद्रीय समिति सदस्य विनोद कुमार पांडेय ने कहा कि भाजपा देश में मनुस्मृति लागू करना चाहती है। भाजपा को देश के संवैधानिक ढांचे पर विश्वास नहीं है। चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर कब्जा किया जा चुका है। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर भी इन्हें आपत्ति है। भाजपा के नेता इस पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? बात-बात पर बयान जारी करने वाले बाबूलाल मरांडी क्यों नहीं इसपर स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं। न्यायपालिका पर देश के गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों का अटूट भरोसा है। निशिकांत दुबे पहले संथाल परगना को झारखंड से अलग करने की बातें कई बार कर चुके हैं। इनकी सोच विभाजनकारी है। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने दुबे के बयान पर कहा कि यह देश के लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान पर सीधा हमला है। भाजपा ने निशिकांत दुबे के बयान से अपने आप को अलग कर लिया है। लेकिन इससे काम नहीं चलने वाला है। अगर वास्तव में भाजपा ने दुबे के बयान से किनारा किया है तो दुबे को तत्काल त्याग पत्र देने के लिए दबाव बनाए। सिर्फ इस बयान से अलग होने का दिखावा करने से भाजपा आरोप से नहीं बच सकती है। प्रदेश राजद के महासचिव कैलाश यादव ने दुबे के बयान को धमकीवाला बताया है। कहा कि सीजेआई को धमकी देना दुर्भाग्यपूर्ण व निंदनीय है। दुबे ने बाबा साहब आंबेडकर द्वारा बनाए गए चट्टानी संविधान को चुनौती दी है। दुबे ने गोड्डा के साथ झारखंड का सम्मान गिराने का काम किया है, ऐसे नेताओं का बहिष्कार होना चाहिए।


