सब स्टेशन मेंटेनेंस:MP में 15 हजार, CG में उसी काम के 31 हजार रुपए

छत्तीसगढ़ में घर-घर में बिजली पहुंचाने के लिए बनाए गए सब स्टेशन के रखरखाव के नाम पर बड़ी अनियमितता सामने आई है। 132 केवी और 220 केवी के प्रत्येक सब स्टेशन के रखरखाव के लिए छत्तीसगढ़ बिजली ट्रांसमिशन कंपनी 31 हजार रुपए से ज्यादा राशि खर्च कर रही है। वही मेंटेनेंस पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में 15 से 18 हजार रुपए में हो हो जा रही है। ऐसे में जो काम आधी कीमत पर हो सकता है, उसके लिए छत्तीसगढ़ की पावर ट्रांसमिशन कंपनी लगभग 154 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में राज्य विद्युत ट्रांसमिशन कंपनी के अंतर्गत बड़ी संख्या में 33 केवी सब स्टेशन के अलावा 132 केवी के 130 सब स्टेशन और 220 केवी के 37 सब स्टेशन संचालित हैं। इन सब स्टेशन के यार्ड की साफ-सफाई, सुरक्षा और रखरखाव के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए की राशि खर्च की जाती है। पावर ट्रांसमिशन कंपनी खुद यह काम न करके आउटसोर्सिंग करती है। इस काम का 3 साल के लिए ठेका दिया जाता है। पावर ट्रांसमिशन कंपनी सब स्टेशन में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन, बोनस आदि खुद देती है, लेकिन रखरखाव के नाम पर ठेका फर्म को मोटी रकम अलग से जारी करती है। छत्तीसगढ़ 132 केवी के 31 हजार, 220 केवी के 40 हजार देती है सीएसपीटीसीएल
सब स्टेशन की मॉनिटरिंग, यार्ड की सफाई का काम संबंधित फर्म को करना है। एक 132 सब स्टेशन में 7 ऑपरेटर, 4 सिक्योरिटी गार्ड व एक क्लिनर होते हैं, इनकी सैलरी सीएसपीटीसीएल देती है, जबकि मेंटेनेंस के लिए फर्म को 31 हजार रु./ सब स्टेशन महीने दिया जाता है। इसी तरह 220 केवी के स्टेशन में 12 कर्मी रखे जाते हैं। यहां फर्म को 40 हजार / स्टेशन मिलते हैं। मप्र लेबर कॉस्ट के 7% के साथ सफाई के 3 से 5 हजार तय, कुल राशि 15 से 18 हजार
मप्र में यार्ड का रखरखाव करने वाले फर्म को कुल लेबर कॉस्ट की 7% राशि ही दी जाती है। यह 132 केवी सब स्टेशन में लगभग 7000 रुपए के लगभग है। सफाई शुल्क के रूप में अलग से 3000 रुपए प्रति माह दिया जाता है। इसी तरह प्रति 220 केवी सब स्टेशन में 7% लेबर कॉस्ट की राशि 9000 रुपए के लगभग है। सफाई शुल्क 5000 रुपए की राशि प्रति माह दी जाती है। सबके टेंडर अपने-अपने तरह से होते हैं। एमपी में बहुत सारी चीजें छूटी हुई हैं, वे कवर नहीं होतीं। इसके लिए वे अलग से कई सारे टेंडर निकालते हैं। हमारे बराबर उनका अमाउंट भी है। हमारे यहां टेंडर ओपनिंग कमेटी बनी है। स्क्रूटनी कमेटी अलग से नहीं बनती है।
– राजेश कुमार शुक्ला, एमडी, सीएसपीटीसीएल

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