सांची में दो दिवसीय महाबोधि महोत्सव रविवार रात को संपन्न हो गया। महोत्सव के अंतिम दिन श्रीलंका के कलाकारों ने लोकनृत्य और लोकगायन के माध्यम से अपनी संस्कृति का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें देश के सुप्रसिद्ध कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम में श्रीलंका की ललिता गोमरा और उनके साथी कलाकारों ने प्रसिद्ध गीत ‘हिमी सरनामर लोक शिवंकर…’ से भगवान बुद्ध को नमन किया। इसके बाद उन्होंने ‘मिथ मल पिपिदेवा…’ गाकर श्रोताओं को आत्मिक शांति का अनुभव कराया। ‘मंगलम पूजा’ से मांगा आशीर्वाद
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए श्रीलंका के दल ने ‘मंगलम पूजा’ की प्रस्तुति दी। यह प्रार्थना श्रीलंका में त्योहारों के समय भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए की जाती है। पांच मिनट की इस अद्भुत प्रस्तुति के बाद भगवान बुद्ध को समर्पित पारंपरिक सिंहली गीत भी प्रस्तुत किए गए। ‘वेस नृत्य’ और उसका इतिहास
कलाकारों ने मंच पर ‘वेस नृत्य’ भी प्रस्तुत किया। किंवदंती के अनुसार, इस नृत्य की उत्पत्ति ‘कोहोम्बा कंकरिया’ नामक एक अनुष्ठान से हुई है, जिसे ‘कोहोम्बा याक कंकरिया’ या ‘कंकरिया’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि मलया राता नामक स्थान के राजा और उनके भाइयों ने पहली कंकरिया नृत्य प्रस्तुति दी थी। इसकी उत्पत्ति भारत की भी मानी जाती है। कलाकारों ने यह नृत्य भगवान बुद्ध को समर्पित कर उनका आशीर्वाद लिया। ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ पर झूमे दर्शक
प्रस्तुतियों के क्रम में कलाकारों ने ‘बुद्धं शरणं गच्छामि…’ गीत पर भी नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवि सम्मेलन में इन्होंने किया काव्य पाठ
समारोह की अंतिम सभा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन की रही। इसमें देश के सुप्रसिद्ध कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इनमें प्रमुख नाम शामिल रहे…


