सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के एक आदेश में जिला एवं सत्र न्यायाधीश (डीजे) के खिलाफ की गई टिप्पणियों को रद्द करते हुए कहा कि हाई कोर्ट अपने न्यायिक आदेश से किसी भी न्यायिक अधिकारी के करियर को नुकसान नहीं पहुंचा सकता हैं। जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस एजी मसीह की खंडपीठ ने यह आदेश टोंक जिला एवं सत्र न्यायाधीश अयूब खान की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को निस्तारित करते हुए दिया। डीजे अयूब खान ने उनके खिलाफ हाई कोर्ट द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने माना था अनुशासनहीनता
दरअसल, टोंक डीजे अयूब खान ने 20 दिसम्बर 2022 को हत्या के प्रयास के आरोपी की जमानत खारिज की थी। आरोपी की अपील पर हाई कोर्ट ने जमानत देते हुए टोंक डीजे के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा था कि न्यायिक अधिकारी ने जमानत याचिका पर फैसला करते हुए हाई कोर्ट के पूर्व आदेशों में दी गई प्रक्रिया की पालना नहीं की। वहीं स्पष्टीकरण मांगे जाने पर अलग-अलग समय पर अलग-अलग विरोधाभासी एवं विपरीत तर्क प्रस्तुत कर इस न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। इससे न्यायालय का समय बर्बाद हुआ है। इन परिस्थितियों में यह मामला न्यायिक निर्देशों की अवहेलना एवं न्यायिक अनुशासनहीनता से संबंधित है। अत यह गंभीर मामला है, तथा संबंधित पीठासीन अधिकारी के संबंध में आवश्यक कार्रवाई हेतु यह तथ्य मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान में लाया जाना आवश्यक है। ट्रायल कोर्ट के विवेक में हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हाई कोर्ट ने जिस तरह से प्रत्येक जमानत याचिका पर फैसला देते समय आरोपी के पिछले आपराधिक रिकोर्ड के चार्ट को विशेष प्रारूप में शामिल करने का आदेश दिया था, यह ट्रायल कोर्ट के विवेक में हस्तक्षेप हैं। कोई भी संवैधानिक न्यायालय ट्रायल कोर्ट को जमानत आवेदनों पर एक विशेष तरीके से आदेश लिखने का निर्देश नहीं दे सकता है। एक संवैधानिक न्यायालय के एक न्यायाधीश का विचार हो सकता है कि ट्रायल कोर्ट को एक विशेष प्रारूप का उपयोग करना चाहिए। दूसरे न्यायाधीश का विचार हो सकता है कि कोई अन्य प्रारूप बेहतर है। हमसे भी गलतियां होने की संभावना
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्यायाधीश भी मनुष्य हैं। सभी मनुष्यों से गलतियां होने की संभावना रहती है। गलतियां करना मनुष्य का स्वभाव है। हमारे देश की लगभग सभी अदालतें अत्यधिक कार्यभार से दबी हुई हैं। ऐसे में हमें याद रखना चाहिए कि जब हम संवैधानिक न्यायालयों में बैठते हैं, तो हमसे भी गलतियां होने की संभावना होती है। इसलिए, न्यायाधीशों की व्यक्तिगत आलोचना या निर्णयों में न्यायाधीशों के आचरण पर निष्कर्ष दर्ज करने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने टोंक डीजे के खिलाफ की गई सभी टिप्पणियों और अन्य आदेशों को रद्द कर दिया।


