सतलुज दरिया के लगातार हो रहे कटाव से जूझ रहे ससराली कॉलोनी के लिए राहत भरी खबर है। अगस्त में आई भीषण बाढ़ के कारण गांव की करीब 250 किले कृषि भूमि दरिया में समा गई थी। इसके बाद अब पंजाब सरकार ने गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों में सफल रही पीपीएमएफ (पॉलीप्रोपाइलीन मल्टीफिलामेंट फाइबर) आधारित जियो-टेक्नोलॉजी को सतलुज नदी में लागू करने का फैसला लिया है। इस प्रोजेक्ट पर 10.5 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। यह टेक्नोलॉजी पंजाब में पहली बार इस्तेमाल की जा रही है। जानें कैसे होगा इस्तेमाल प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पीपीएमएफ फाइबर पानी में सड़ता नहीं है और लंबे समय तक मजबूत बना रहता है। इसकी लागत कंक्रीट और पत्थर के पारंपरिक तटबंधों से कम होती है, वहीं इसे लगाने में समय भी कम लगता है। पर्यावरण अनुकूल इस तकनीक में सबसे पहले नदी के किनारे के ढलान को एक समान किया जाता है। पॉलिमर मेंब्रेन या जियो-टेक्सटाइल शीट को ऊपर से नीचे की ओर बिछाया जाता है। शीट के ऊपर स्थानीय मिट्टी या बालू की परत चढ़ाई जाती है। अक्सर शीट के छिद्रों के माध्यम से घास या छोटे पौधे लगाए जाते हैं। पौधों की जड़ें पॉलिमर जाल के साथ मिलकर एक “बायो-इंजीनियरिंग” कवच बना लेती हैं, जो कटाव को लगभग शून्य कर देता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र भी हुई मजबूत इस परियोजना के तहत सतलुज नदी के संवेदनशील किनारों पर पीपीएमएफ फाइबर से बने जियो-बैग, जियो-मैट और जियो-टेक्सटाइल शीट्स लगाई जा रही हैं। इन फाइबर बैग्स को रेत से भरकर नदी के किनारे बिछाया जाएगा और ऊपर से मिट्टी व पत्थरों की पिचिंग की जाएगी। इससे तेज बहाव के बावजूद मिट्टी अपनी जगह बनी रहेगी और नदी का कटाव रुकेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वही तकनीक है जिसका उपयोग नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा नदी और असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारों को सुरक्षित करने के लिए किया गया है। वहां इस तकनीक से तटबंध मजबूत हुए हैं और बाढ़ से होने वाला नुकसान काफी हद तक कम हुआ है।


