लुधियाना| देवों के देव महादेव और माता पार्वती के पावन मिलन का पर्व महाशिवरात्रि इस वर्ष 15 फरवरी यानी कल रविवार को मनाया जाएगा। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि इस बार भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर आ रही है। शास्त्रों के अनुसार इसी कालखंड में भगवान शिव ने तांडव करते हुए अपनी तीसरी आंख खोली थी और सृष्टि के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया था। निशिता काल में सबसे विशेष पूजा का समय 16 फरवरी की मध्यरात्रि 12:09 से 01:01 तक रहेगा। जो श्रद्धालु पूर्ण विधि-विधान से व्रत रखते हैं उनके लिए पारण का सबसे उत्तम समय 16 फरवरी को सुबह 07:05 के बाद चतुर्दशी तिथि समाप्त होने पर रहेगा। पंडित कमलेश शास्त्री के अनुसार चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी को सुबह 09:11 बजे प्रारंभ होकर 16 फरवरी की सुबह 07:05 बजे तक रहेगी। चूंकि महाशिवरात्रि में निशिता काल यानी मध्यरात्रि की पूजा का सर्वाधिक महत्व है और वह 15 फरवरी की रात को ही प्राप्त हो रहा है, इसलिए व्रत और मुख्य अनुष्ठान इसी दिन संपन्न किए जाएंगे। शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि की रात को चार भागों में बांटकर पूजा करने का विधान है। पंडित कमलेश शास्त्री ने इन चारों प्रहरों का विस्तृत विवरण साझा किया है। • प्रथम प्रहर: शाम 06:11 से रात 09:23 बजे तक। भगवान भोलेनाथ को दूध अर्पित किया जाएगा। इससे कष्टों का निवारण होता है। • द्वितीय प्रहर: रात 09:23 से रात 12:35 बजे तक। भगवान भोलेनाथ को दही अर्पित किया जाएगा, जिससे सुख-समृद्धि और अर्थ की प्राप्ति होती है। • तृतीय प्रहर: रात 12:35 से तड़के 03:47 बजे तक। भगवान भोलेनाथ को घी अर्पित किया जाएगा, जिससे भौतिक इच्छाओं की पूर्ति और काम की सिद्धि होगी। • चतुर्थ प्रहर: तड़के 03:47 से सुबह 06:59 बजे तक। भगवान भोलेनाथ को शहद अर्पित किया जाएगा जो जन्म-मरण से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का अभिषेक केवल जल से ही नहीं बल्कि पंचामृत से करना अत्यंत फलदायी माना गया है। {बेलपत्र: तीन पत्तों वाला अखंडित बेलपत्र जिस पर राम या ओम लिखा हो। {धतूरा और भांग: जो हमारी बुराइयों और तामसिक प्रवृत्तियों के त्याग का प्रतीक हैं। {अक्षत और भस्म: अखंड चावल धन-धान्य देते हैं तो भस्म शिव के वैराग्य और तेज को दर्शाती है।


