सिटी एंकर हर महीने 50 से 60 लोग मामूली थकान, सिरदर्द, गैस या पेट दर्द को गंभीर बीमारी मानकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार यह मानसिक स्थिति हाइपोकॉन्ड्रियासिस कहलाती है, जिसमें व्यक्ति छोटी तकलीफ को जानलेवा मान लेता है। मनोचिकित्सक डॉ. संदीप गोयल कहते हैं कि मरीज को सिरदर्द हो तो वह ब्रेन ट्यूमर, सीने में दर्द हो तो हार्ट अटैक का डर पाल लेता है। इस डर के चलते लोग न केवल बेवजह जांचें करवा रहे हैं, बल्कि मानसिक शांति और नींद भी खो रहे हैं। डॉक्टरों ने कहा कि सोशल मीडिया पर भरोसा न करें तभी सही रहेगा। यह स्थिति इलाज योग्य है, जरूरत है सही काउंसलिंग व मार्गदर्शन की। सेहत का ध्यान रखें, लेकिन डर को बीमारी न बनने दें। रिपोर्ट नॉर्मल तब भी लोगों को जानलेवा बीमारियों का डर सता रहा केस 1 : सिर दर्द को ब्रेन ट्यूमन मान बैठी युवती: 26 साल की एक ग्राफिक डिजाइनर को काम का प्रेशर था, जिस वजह से सिरदर्द और थकान आम हो गया था। इसके लिए वह इंटरनेट खंगालती रहती थी और इस आधार पर खुद को ब्रेन ट्यूमर का मरीज मान बैठी और बीमारी से नहीं, बीमारी के डर से जूझने लगी। इतनी चिंता बढ़ गई कि नींद तक उड़ गई। जब वह डॉक्टर के पास पहुंचीं, तो सभी रिपोर्ट्स बिल्कुल ठीक थीं, लेकिन मन बीमार था। अब इलाज और काउंसलिंग से वह धीरे-धीरे खुद को बेहतर महसूस कर रही हैं। केस 2 : महिला सीने के दर्द को हार्ट की बीमारी समझी : एक 35 साल की महिला को बार-बार सीने में दर्द महसूस होता था। वह मान बैठी थी कि उसे हार्ट की कोई गंभीर बीमारी है। कई बार ईसीजी और अन्य टेस्ट करवाए गए, पर हर बार रिपोर्ट नॉर्मल आई। उसे नींद नहीं आती, धड़कन तेज हो जाती और पसीना आता। बाद में काउंसलिंग में पता चला कि यह सब उसकी चिंता और डर की वजह से हो रहा था, असल में उसे कोई हार्ट प्रॉब्लम नहीं थी। केस 3 : छोटी रसौली को महिला ने कैंसर समझा: 36 साल की एक टीचर का स्वास्थ्य संबंधी इश्यू होने पर अल्ट्रासाउंड कराया तो चेकअप के दौरान डॉक्टर ने पेट में छोटी रसौली देखी और बताया कि यह सामान्य है, लेकिन उसने उसे खुद ही कैंसर मान लिया। इसके बाद कई अलग-अलग डॉक्टरों से सलाह ली और फिर से अल्ट्रासाउंड करवाया, लेकिन सभी का एक ही कहना था कि घबराने की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद उसे लगने लगा कि डॉक्टर कुछ छिपा रहे हैं। इस डर में स्वास्थ्य बिगड़ गया।


