सोशल मीडिया पर पहचान और लोकप्रियता पाने की दौड़ अब सिर्फ करियर ट्रेंड नहीं रही है, बल्कि यह कंटेंट क्रिएटर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन गई है। शहर के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में ऐसे केस सामने आए हैं, जहां युवा और प्रोफेशनल क्रिएटर्स लगातार लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स बनाए रखने के दबाव में घबराहट, बेचैनी और आत्मविश्वास में गिरावट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई क्रिएटर्स 24*7 अपने फोन में बंधे रहते हैं। वीडियो पोस्ट करें या ट्रेंड फॉलो करें, सब कुछ एक कंपीटिशन की तरह लगने लगा है। अगर रील पर व्यूज कम आए या नेगेटिव कमेंट्स आए, तो बेचैनी, स्ट्रेस और नींद न आने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। कई क्रिएटर्स ने तो मानसिक तनाव को ही कंटेंट में भुनाना शुरू कर दिया है, जिससे स्थिति और पेचीदा हो गई है। केस 1: रील्स का प्रेशर बना पैनिक अटैक : 22 साल की एक कंटेंट क्रिएटर, जो फैशन और लाइफस्टाइल रील्स बनाती थी, जैसे ही वीडियो पर व्यूज कम आते, उसे बेचैनी, तेज धड़कन और नींद न आने की समस्या होने लगी। हर रील पोस्ट करने का पल तनावपूर्ण हो गया। वीडियो अपलोड करना बाकी होता, घबराहट बढ़ जाती। हालात तब बिगड़े जब उसे पैनिक अटैक आया और परिवार ने उसका तुरंत ट्रीटमेंट करवाया। केस 2: अंदर टूटता आत्मविश्वास : 28 साल का एक कंटेंट क्रिएटर, हजारों फॉलोअर्स और ब्रांड डील्स के बावजूद, अंदर से टूटता जा रहा था। हर नेगेटिव कमेंट और व्यूज में गिरावट उसे अंदर से परेशान करने लगी। वह सोचने लगा, अगर ऑनलाइन एक्टिव नहीं रहा तो पहचान खत्म हो जाएगी। आत्मविश्वास डगमगाने लगा और डिप्रेशन के लक्षण दिखने लगे। अब वह डिजिटल ब्रेक लेकर मानसिक स्थिति सुधार रहा है। केस 3: वर्कलोड और क्रिएशन का डबल प्रेशर : एक क्रिएटर दिनभर रील्स और वीडियो बनाने में व्यस्त रहती थी। दिनभर की थकान के बावजूद कंटेंट तैयार करना उसकी मजबूरी बन गया। लाइक्स और फॉलोअर्स बढ़ाने के दबाव ने उसे तनाव, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन दे दिया। काउंसलिंग के बाद उसे समझ आया कि हर ट्रेंड फॉलो करना जरूरी नहीं और ब्रेक लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।


