देश में फैटी लिवर तेजी से साइलेंट महामारी बनता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इसकी व्यापकता 38.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, यानी हर तीन में से एक भारतीय इससे प्रभावित है। अस्पतालों में यह दर 40.8 प्रतिशत और समुदाय स्तर पर 28.1 प्रतिशत पाई गई है। पूर्वी और उत्तरी भारत में मामले अधिक हैं। शहरी क्षेत्रों में बैठी जीवनशैली, मोटापा और खराब खानपान से जोखिम बढ़ रहा है। इसी बीच एम्स भोपाल के वैज्ञानिकों की रिसर्च से नई उम्मीद जगी है। अध्ययन में सामने आया कि फैटी लिवर की शुरुआती और सटीक पहचान के लिए अब केवल अल्ट्रासाउंड या बायोप्सी पर निर्भर नहीं रहना होगा। खून के बायोमार्कर बीमारी पहचान में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यह शोध डॉ. दीपा रोशनी ने डॉ. सुखेस मुखर्जी के मार्गदर्शन में चौथे रिसर्च डे में प्रस्तुत किया। सीके-18 का संबंध लिवर में फैट जमाव से
एम्स भोपाल के जैव रसायन और जनरल मेडिसिन विभाग के संयुक्त शोध में 182 लोगों को शामिल किया गया। फाइब्रोस्कैन और कैप स्कोर को मानक मानते हुए तीन बायोमार्करों एड्रोपिन, आइरिसिन और साइटोकेराटिन-18 (सीके-18 / केआरटी 18) का विश्लेषण किया गया। शोध में सीके-18 सबसे ताकतवर बायोमार्कर के रूप में उभरा। इसकी पी-वैल्यू 0.005 रही, जो बेहद मजबूत सांख्यिकीय अंतर दर्शाती है। वहीं इफेक्टिव साइज 0.85 पाया गया, यानी बीमारी के साथ इसमें बड़ा और स्पष्ट बदलाव होता है। सीके-18 का सीधा संबंध लिवर में फैट जमाव, फाइब्रोसिस और लिवर एंजाइम से पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह लिवर कोशिकाओं की क्षति का सीधा संकेत देता है। आसान शब्दों में कहें तो लिवर जितना ज्यादा खराब, सीके-18 उतना ज्यादा। आइरिसिन की दस्तक, पर फैसला बाकी
शोध के अनुसार आइरिसिन के नतीजे उतने स्पष्ट नहीं रहे। इसकी पी-वैल्यू 0.07 रही, जो 0.05 की सीमा से थोड़ा ऊपर है। यानी अभी यह पूरी तरह निर्णायक नहीं, लेकिन इफेक्टिव साइज 0.45 ने संकेत दिया कि शरीर में जैविक बदलाव जरूर हो रहा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि बड़े सैंपल और आगे के अध्ययन में आइरिसिन फैटी लिवर की कहानी में अहम कड़ी बन सकता है। शोध की सबसे अहम बात यह रही कि जब तीनों बायोमार्करों को एक साथ देखा गया, तो फैटी लिवर की पहचान की सटीकता 88.5% तक पहुंच गई। यानी भविष्य में बायोमार्कर पैनल जांच का नया रास्ता बन सकता है। क्यों अहम है यह खोज?
अब तक फैटी लिवर की पहचान अक्सर देर से होती थी, जब बीमारी सिरोसिस या लिवर कैंसर की ओर बढ़ चुकी होती थी। एम्स भोपाल की यह रिसर्च संकेत देती है कि बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है। बायोप्सी जैसी जोखिम भरी जांच से बचा जा सकता है। यह एक सार्थक पहल है
शोध फैटी लिवर जैसे तेजी से बढ़ते रोग की समय पर पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। गैर-आक्रामक बायोमार्करों पर आधारित यह अध्ययन रोगियों को अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी जांच की सुविधा प्रदान करने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
-डॉ. माधवानंद कर, प्रभारी डायरेक्टर, एम्स भोपाल


