भास्कर न्यूज | कवर्धा छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों में वर्षों से अध्यापन कार्य कर रहे अतिथि व्याख्याता पिछले 12 वर्षों से अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं। लेकिन अब तक उच्च शिक्षा विभाग ने उनकी समस्याओं पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया है। इससे नाराज अतिथि व्याख्याताओं ने एक बार फिर शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर जॉब सुरक्षा और सेवा शर्तों में सुधार की मांग उठाई है। प्रदेशभर के शासकीय महाविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। नियमित प्राध्यापकों की कमी के बीच यही अतिथि व्याख्याता शिक्षण, परीक्षा, मूल्यांकन और शैक्षणिक गतिविधियों का भार संभाल रहे हैं। इसके बावजूद अतिथि व्याख्याताओं के लिए कोई स्थायी नीति नहीं है। उन्हें केवल 10 से 11 महीने तक ही कार्य मिलता है। सत्र समाप्त होते ही उनकी सेवाएं स्वतः समाप्त कर दी जाती हैं और उन्हें बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। नई नियुक्ति के लिए उन्हें हर वर्ष अनिश्चित प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कभी जुलाई, कभी अगस्त तो कभी दिसंबर में नियुक्ति दी जाती है। इससे उनकी आय और जीवन दोनों प्रभावित होते हैं। भेदभाव के आरोप, मनमानी भी हो रही: अतिथि व्याख्याताओं का आरोप है कि कालखंड आधारित मानदेय व्यवस्था के कारण महाविद्यालयों में भेदभाव और मनमानी को बढ़ावा मिला है। किसी अतिथि व्याख्याता को दो कालखंड, किसी को 3 तो किसी को 4 कालखंड का मानदेय दिया जाता है। कहीं अतिरिक्त कार्य का भुगतान होता है तो कहीं नहीं। इसकी वजह से छात्रों के भविष्य पर भी खतरा बढ़ा अतिथि व्याख्याताओं का कहना है कि शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है, जिसके लिए पूरे वर्ष शिक्षकों की आवश्यकता होती है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति केवल 10-11 महीने तक सीमित है। इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। नियमित प्राध्यापकों की कमी है। मध्यप्रदेश और हरियाणा राज्य में बेहतर व्यवस्था अतिथि व्याख्याताओं ने उदाहरण देते हुए बताया कि मध्यप्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में उनकी स्थिति छत्तीसगढ़ से बेहतर है। मध्यप्रदेश में अतिथि व्याख्याताओं को मासिक वेतन, सवैतनिक अवकाश, स्थानांतरण सुविधा, पीएससी परीक्षा में आरक्षण और निरंतर कार्यरत अतिथि व्याख्याताओं को सेवा से बाहर न करने की नीति लागू है।


