रिम्स में करीब एक साल पहले शुरू हुए 310 बेडे का परिजन विश्राम गृह अबतक पूरी तरह फंक्शनल नहीं बन सका है। केवल पहले तल्ले के 50 बेड पर मरीज के परिजनों को जगह दी जा रही है। शेष तल्ले के कमरों में ताला लगा हुआ है। हालांकि, रिम्स प्रबंधन ने दो माह पहले विश्राम गृह के बेहतर संचालन के लिए टेंडर निकाला था। लेकिन प्रबंधन ने टेंडर यह कह कर रद्द कर दिया कि तय मापदंड को कोई भी एजेंसी पूरा नहीं कर सकी। ऐसे में अब प्रबंधन ने दावा किया है कि जल्द बेहतर संचालन के लिए नए सिरे से नई निविदा निकाली जाएगी। रिम्स के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजीव रंजन के अनुसार, री-टेंडर में पुरानी कुछ शर्तों में बदलाव भी किए जाएंगे। ताकि एजेंसी रिम्स के मापदंड को पूरा कर सके और संचालन के लिए एजेंसी का चयन हो सके। बताते चलें कि प्रबंधन ने पूर्व में निकाले टेंडर में विश्राम गृह के संचालन करने के लिए एजेंसी का रेट फिक्स किया था। इसके तहत भर्ती मरीज व उनके परिजनों से शुरूआत के 7 दिनों के लिए लिए जाएंगे 75 रु. प्रतिदिन, 7 दिन के बाद से रोजाना के 100 रुपये तय किए गए थे। लेकिन न तो एजेंसी का चयन हो सका और न ही रेट लागू हो सकी। अब ये व्यवस्था एजेंसी को करनी होगी… पूर्व के टेंडर में ये भी थीं शर्तें… मरीजों के परिजनों के लिए संपूर्ण व्यवस्थापन, रिसेप्शन, सफाई, सुरक्षा, किचन, डायनिंग, लॉन्ड्री, मरम्मत इत्यादि की व्यवस्था करनी होगी। भवन के संचालन के लिए आवश्यक सुविधा जैसे प्लंबर, मिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन आदि की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। एक जनरल प्रोविजन स्टोर और एक कंप्यूटर/ प्रिंटर/ फोटोकॉपी सेंटर की स्थापना करनी होगी। सभी बिल (बिजली, पानी, डीजी सेट, सीसीटीवी, फायर अलार्म आदि) का भुगतान करना होगा। पुराने टेंडर में एनजीओ व चैरिटेबल ट्रस्ट के लिए 1 करोड़ का टर्नओवर व एक करोड़ के कॉर्पस फंड की थी शर्त प्रबंधन द्वारा पूर्व के जारी ईओआई के अनुसार, विश्राम गृह का संचालन एनजीओ या चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कराया जाना है। इनके द्वारा पूरे भवन की व्यवस्था संभाली जाएगी। चयनित एजेंसी के साथ रिम्स प्रबंधन 5 साल के लिए एमओयू करती। लेकिन शर्तों के अनुसार, कम से कम 7 वर्षों से पंजीकृत गैर लाभकारी संस्था होना अनिवार्य। 200 बेड वाले किसी ऐसे सुविधा केंद्र के संचालन का अनुभव हो। और सबसे महत्वपूर्ण बीते तीन वर्षों का औसत टर्नओवर 1 करोड़ से अधिक हो और न्यूनतम 1 करोड़ की कॉर्पस राशि हो। अधिकांश एनजीओ और चैरिटेबल ट्रस्ट इसे पूरा नहीं कर सके। अब प्रबंधन इन शर्तों में बदलाव कर सकता है।


