छत्तरगढ़ उपखंड में 6112 बीघा (1546 हेक्टेयर) जमीन के फर्जी आवंटन के मामले में नया मोड़ आया है। वन विभाग ने भी अपनी जमीन को लेकर मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर ली है। इस संबंध में जिला कलेक्टर सहित उपखंड अधिकारियों ने फर्जीवाड़े के दौरान छत्तरगढ़ में पदस्थापित रहे अधिकारियों और कर्मचारियों का ब्यौरा मांगा है। मामला छत्तरगढ़ के चक 1 आरएसएम में 90 बीघा और चक 2 डीएलएम में 270 बीघा वन भूमि के फर्जी तरीके से आवंटन का है। वन खंड चक 1 आरएसएम में 90 बीघा जमीन सीधे ही पांडूसर के पांच लोगों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर दी गई थी, जबकि वन खंड 2 डीएलएम में 270 बीघा जमीन को अराजीराज घोषित कर आठ लोगों के नाम म्यूटेशन कराने की तैयारी की जा रही थी। इसी दौरान जमीन घोटाला उजागर होने के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। जिला कलेक्टर ने प्रकरण की जांच में प्रथम दृष्टया तत्कालीन तहसीलदार को इसके लिए दोषी माना था। संभागीय मुख्य वन संरक्षक हनुमानाराम ने जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर इस प्रकरण में जिम्मेदार उपखंड अधिकारी, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, गिरदावर, ऑफिस कानूनगो, पटवारी व अन्य कर्मचारियों की सूचना भेजने का आग्रह किया है। इनके विरुद्ध सक्षम न्यायालय में वन संरक्षण अधिनियम की धारा 02, 3ए व 3बी के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा। एसीबी को मिला रिकॉर्ड, अब चालान की तैयारी छत्तरगढ़–पूगल जमीन घोटाले को लेकर एसीबी की जांच निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। राजस्व विभाग से ज्यादातर रिकॉर्ड मिल चुका है। दोनों प्रकरणों में चालान पेश करने की तैयारी की जा रही है। एसीबी में जमीन घोटाले को लेकर दो आरएएस अधिकारियों, 34 से अधिक अधिकारी–कर्मचारियों के अलावा 80 से ज्यादा लाभार्थियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के दो मुकदमे इसी साल मार्च में दर्ज हुए थे। गौरतलब है कि छत्तरगढ़ उपखंड में 6112 बीघा और पूगल में लगभग 2010 बीघा जमीन में हेराफेरी पाई गई थी, जिससे सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान हुआ था। चक 1 आरएसएम में 90 बीघा और 2 डीएलएम में 270 बीघा का मामला चक 1 आरएसएम में कुल 1600 बीघा में से करीब 90 बीघा जमीन का दोहरा आवंटन हुआ था। यह जमीन 1977 में वन विभाग को दी गई थी। महाजन फील्ड फायरिंग रेंज विकसित होने पर 34 गांव सेना को सौंप दिए गए। वहां से विस्थापित हुए सीताराम पुत्र बोदूलाल (खसरा नंबर 152/30), गंगूराम पुत्र नागरमल (खसरा नंबर 152/38), खुमा पुत्र रुघा लौहार (खसरा नंबर 152/39), खुमा पुत्र रुघा लौहार (खसरा नंबर 152/46) को 1987 में आवंटन कर दिया गया, जबकि विस्थापितों को अराजीराज जमीन दी जानी चाहिए थी। म्यूटेशन दर्ज होने के बाद 1992 में इन लोगों ने अपनी फाइलें लूणकरणसर तहसील के पांडूसर निवासी जगदीश, शांति, गोमती, विद्यादेवी और शांति पत्नी बीरबलराम को बेच दीं। पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए बयनामे तैयार किए गए और नामांतरण खुलवाया गया, लेकिन 29 दिन के भीतर ही इंतकाल खारिज हो गया। 2023 में राहत शिविर में एक प्रशासनिक आदेश के जरिए पांचों के नाम जमीन का नामांतरण दर्ज कर दिया गया था। इसी प्रकार वन विभाग को चारागाह विकास के लिए 1977 में 1200 बीघा जमीन चक 2 डीएलएम में आवंटित की गई थी। जांच से पता चला कि तत्कालीन तहसीलदार ने आठ अलग-अलग आदेश जारी कर इस जमीन में से 270 बीघा को सीधे ही अराजीराज दर्ज कर सरकारी घोषित कर दिया। एक काश्तकार के नाम म्यूटेशन भी खोल दिया गया, लेकिन तब तक तहसीलदार बदल गया। नए तहसीलदार के सामने मामला आया तो उन्होंने म्यूटेशन खारिज कर दिया। छानबीन हुई तो गड़बड़ी सामने आ गई। जमीन माफिया के हाथों में जाने से बच गई। “वन भूमि काे अवैध तरीके से गैर वानिकी प्रयोजनार्थ निजी व्यक्तियों के नाम आवंटन करने के दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की सूचना मांगी है। उनके विरुद्ध वन अधिनियम के तहत केस दर्ज कराया जाएगा।” -दिलीप सिंह राठौड़, उप वन संरक्षक, स्टेज-प्रथम, छत्तरगढ़


