52.40 करोड़ के टेंडर में गड़बड़ी के आरोप में सस्पेंड 7 ट्रस्ट अफसरों को हाईकोर्ट से राहत, अगली सुनवाई 16 अप्रैल को

भास्कर न्यूज | अमृतसर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के 52.40 करोड़ के टेंडर में गड़बड़ी पर सस्पेंड 7 अफसरों की सस्पेंशन पर स्टे लगा दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल 2026 को होगी। इन अफसरों के एडवोकेट राजीव आत्माराम और शेफाली बहिया ने कोर्ट में दलील दी कि डीसी ने एडीसी डवलपमेंट शहरी के नेतृत्व में 4 मेंबरी जांच कमेटी बनाई थी। इसमें एडीसी चेयरपर्सन, एक्सईएन पीडब्ल्यूडी, एक्सईएन वाटर सप्लाई एंड सेनिटेशन और डीसीएफए मेंबर थे। मगर कमेटी में टेंडर को ई-वैल्यूएट करने को कोई टेक्निकल अफसर (इंजीनियर) नहीं था। जांच अफसर ने सस्पेंड किए गए किसी भी अफसर को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया और जांच रिपोर्ट चंडीगढ़ भेज दी। वहीं, सेक्रेटरी लोकल बॉडीज ने भी ट्रस्ट अफसरों का पक्ष सुनने की बजाय सीधे सस्पेंड कर दिया। सस्पेंशन के खिलाफ अफसरों ने बीते 9 जनवरी को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका डाली थी। कोर्ट से स्टे ऑर्डर के बाद लोकल बॉडीज विभाग के सेक्रेटरी की ओर से जारी चार्जशीट का जवाब देने के लिए अफसर बाध्य नहीं होंगे। अफसरों के खिलाफ अब सरकार आगे कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगी। सस्पेंड अफसर पहले की तरह अपनी सीट पर काम कर सकेंगे। रणजीत एवेन्यू ब्लॉक-सी और 97 एकड़ स्कीम के डेवलपमेंट को लेकर 52.40 करोड़ के टेंडर की फाइनेंशियल बिड 18 दिसंबर 2025 को ओपन हुई। शर्मा कांट्रेक्टर 1.08% का लेस देकर एच-1 बिडर बनी थी। वहीं, सीगल इंडिया व गणेश कार्तिकेय कंस्ट्रक्शन के डाक्यूमेंट्स पूरे न होने और टेक्निकल खामी पर फाइनेंशियल बिड से पहले ही बाहर हो गई थी। सीगल इंडिया ने चीफ सेक्रेटरी से मामले की शिकायत की थी। जिसके बाद चीफ सेक्रेटरी ने मामले की जांच डीसी को सौंपी थी। डीसी ने 4 मेंबरी जांच कमेटी का गठन किया था। रिपोर्ट के बाद लोकल बॉडीज सेक्रेटरी आईएएस मनजीत बराड़ ने 30 दिसंबर को 7 अफसरों को सस्पेंड कर दिया था। जिसमें एसई सतभूषण सचदेवा, एक्सईएन रमिंदरपाल काहलों, एक्सईएन बिक्रम सिंह, एसडीओ सुखरिपन पाल सिंह, शुभम धिपेश, एसडीओ मनप्रीत सिंह और जूनियर इंजीनियर मनदीप सिंह का नाम शामिल था। टेंडर में गड़बड़ी को लेकर चीफ सेक्रेटरी से शिकायत के बाद जांच और अफसरों पर सस्पेंशन की कार्रवाई शुरू हुई मगर टेंडर को बहाल ही रखा गया। वहीं लोकल बॉडीज विभाग के सेक्रेटरी ने जांच के लिए 5 मेंबरी टेक्निकल कमेटी बनाई जो टेंडर का रिवैल्यूएशन करने के बाद रिपोर्ट सौंपेगी। लेकिन 12 दिन बाद भी जांच रिपोर्ट अधूरी है। लोकल बॉडीज विभाग के सेक्रेटरी ने 6 जनवरी 2026 को ट्रस्ट के अफसरों को चार्जशीट जारी कर 21 दिन के भीतर जवाब मांगा। टेंडर टाइमलाइन : 97 एकड़ और रंजीत एवेन्यू सी-ब्लॉक से जुड़ा 52.40 करोड़ का ऑनलाइन टेंडर 31 अक्टूबर 2025 को लगाया गया। बार-बार कोरिजंडम : 19 नवंबर 2025 को पहला कोरिजंडम लगाया गया, जिसमें टेंडर सब्मिट करने की आखिरी तारीख 15 दिसंबर दोपहर 3 बजे तय की गई। 3 दिसंबर को दूसरे कोरिजंडम में टेंडर की शर्तें बदलीं। 8 दिसंबर को तीसरे में कोरिजंडम में टेंडर रकम 52.82 करोड़ की। टेक्निकल बिड : 15 दिसंबर 2025 को शाम 4 बजे टेक्निकल टेंडर खोला गया, जिसमें सीगल इंडिया, शर्मा कांट्रेक्टर , राजिंदर इंफ्रास्ट्रक्चर और गनेश-कार्तिक कंस्ट्रक्शन ने हिस्सा लिया। डीएनआईटी के क्लॉज 32 का उल्लंघन : डीएनआईटी के क्लॉज 32 के तहत सिमिलर वर्क की डेफिनेशन में केवल रोड वर्क की डिटेल दी गई थी। इलेक्ट्रिकल वर्क की कोई डिटेल शामिल नहीं थी। इलेक्ट्रिकल वर्क की गलत एंट्री : नियमों के अनुसार इलेक्ट्रिकल काम की रकम और डिटेल ठेकेदार की बिड में अलग से दिखाना सही नहीं था, इसके बावजूद ऐसा किया गया। पुराने प्रस्ताव और एस्टीमेट में गड़बड़ी : प्रस्ताव नंबर 4 को 15 फरवरी 2021 को 38 करोड़ के एस्टीमेट के साथ पास किया गया था। इसे डायरेक्टर लोकल बॉडीज ने 5 अप्रैल 2021 को मंजूरी दी थी। बिना जरूरी प्रक्रिया के एस्टीमेट बढ़ाना : 18 अगस्त 2025 को प्रस्ताव के जरिए एस्टीमेट 38 करोड़ से बढ़ाकर 53 करोड़ किया। इसे सूचना के लिए सरकार को भेजा गया। मंजूरी नहीं ली : पहले से पास प्रस्ताव में बदलाव के बाद नया प्रस्ताव पास करवाने की ट्रस्ट से मंजूरी नहीं ली। आपत्तियों की अनदेखी : सरकार ने 23 अक्टूबर को निगरान इंजीनियर के जरिए समर्थ अथॉरिटी की मंजूरी के बाद ऑब्जेक्शन लगाए। रिमाइंडर की अनदेखी : ऑब्जेक्शन का जवाब नहीं मिलने पर 31 अक्टूबर और 23 दिसंबर को रिमाइंडर भेजा गया, लेकिन ट्रस्ट ने कोई जवाब नहीं दिया। नियमों के खिलाफ टेंडर : सरकारी आपत्तियों के बावजूद 31 अक्टूबर 2025 को टेंडर लगा दिया गया, जो सरकार के नियमों और हिदायतों के बिल्कुल उलट था। लापरवाही का आरोप : आरोप है कि निजी हितों के चलते ड्यूटी में लापरवाही बरती गई। ट्रस्ट को वित्तीय नुकसान पहुंचाने की कोशिश की।

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